Transliteration: (Wa izaaa unzilat Sooratun an aaminoo billaahi wa jaahidoo ma'a Rasoolihis taazanaka uluttawli minhum wa qaaloo zarnaa nakum ma'alqaa 'ideen)
इस आयत की बिना पर कुछ उलमा ने कहा है कि जिहाद का दर्जा ईमान के बाद है, क्योंकि इसका ज़िक्र ईमान के फ़ौरन बाद किया गया है। इससे मालूम होता है कि जिहाद बहुत फ़ज़ीलत वाली इबादत है।
हालाँकि हक़ीक़त यह है कि इबादत में नमाज़ का सबसे बुलंद दर्जा है, क्योंकि जिहाद उसे क़ायम करने के लिए जायज़ हुआ। यह आयत ख़ास उस वक़्त के बारे में है जब जिहाद की सख़्त ज़रूरत थी, और उस लम्हे में उसकी अहमियत पर ज़ोर देती है।
यह आयत सिखाती है कि जो लोग मजबूर या नाक़ाबिल हैं, उनके लिए जिहाद से बाज़ रहना मना नहीं। यह मानती है कि कुछ लोग अपने हालात की वजह से जंग में शामिल नहीं हो सकते।
इससे मुराद उन लोगों की दरख़्वास्त है जो जिहाद में शामिल होने से क़ासिर थे — वे बच्चों, औरतों, बीमारों और मजबूरों जैसे जंग न कर सकने वालों के साथ रहने की इजाज़त चाहते थे।
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