Transliteration: (Wa laa tusalli 'alaaa ahadim minhum maata abadanw wa laa taqum 'alaa qabriheee innahum kafaroo billaahi wa Rasoolihee wa maatoo wa hum faasiqoon)
यह आयत नमाज़-ए-जनाज़ा की दलील है, जो बताती है कि काफ़िरों की नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ना मना है। नमाज़-ए-जनाज़ा सिर्फ़ मोमिनों के लिए है। इसी तरह काफ़िरों की क़ब्रों की ज़ियारत मना है।
हालाँकि नबी करीम ﷺ को अपनी वालिदा हज़रत बीबी आमिना की क़ब्र की ज़ियारत की इजाज़त थी, जो मोमिना थीं, लेकिन उनके लिए माफ़ी की दुआ की इजाज़त नहीं थी, क्योंकि वे (क़ब्र के अज़ाब से) बेगुनाह थीं।
यह हमें सिखाता है कि नमाज़-ए-जनाज़ा हर कलमा पढ़ने वाले के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ़ सच्चे ईमान वालों के लिए है।
इस आयत के नुज़ूल की वजह यह है कि जब मशहूर मुनाफ़िक़ अब्दुल्लाह बिन उबै मरा, तो उसके बेटे अब्दुल्लाह ने नबी ﷺ से दरख़्वास्त की कि वे उसकी नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ें और अपनी मुबारक क़मीज़ उसे दे दें, जैसा उसकी वसीयत में था। उस वक़्त मुनाफ़िक़ों की नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ने की मनाही नहीं थी।
हज़रत उमर (रज़ि.) के रोकने के बावजूद, नबी ﷺ ने दरख़्वास्त क़बूल की, इस जानकारी के साथ कि इस नेक अमल की वजह से एक हज़ार काफ़िर इस्लाम क़बूल करेंगे।
यह आयत यह देखकर नाज़िल हुई कि इब्न उबै जैसा इंसान भी नबी ﷺ के कपड़ों से बरकत लेना चाहता था, और नतीजे में एक हज़ार काफ़िर मुसलमान हुए। इससे कई बातें निकलती हैं:
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