Transliteration: (Fa ir raja'akal laahu ilaa taaa'ifatim minhum fastaaa zanooka lilkhurooji faqul lan takhrujoo ma'iya abadanw wa lan tuqaatiloo ma'iya 'aduwwan innakum radeetum bilqu'oodi awwala marratin faq'udoo ma'al khaalifeen)
इससे मुराद यह है कि जब नबी ﷺ ग़ज़वा-ए-तबूक से मदीना मुनव्वरा लौटेंगे, तो ये मुनाफ़िक़ धोखे से कहेंगे: "ऐ अल्लाह के नबी! हमें आगे की जंगों में शामिल होने की इजाज़त दीजिए।"
इस आयत में पेशीनगोई है कि वे ऐसा कहेंगे, लेकिन शर्तों के साथ — जो उनकी बेईमानी को ज़ाहिर करता है।
इस ख़बर से इनकार ज़ाहिर होता है। आगे वे जिहाद में शामिल होने की इजाज़त नहीं पाएँगे, क्योंकि उन्होंने पहली बार पीछे रहना चुना। यह बताता है कि अल्लाह की राह में जंग का बुलावा आने पर पीछे रहने का उनका पहला फ़ैसला, आगे के मौक़ों से उनके महरूम रहने का सबब बना।
इससे कुछ मसाइल निकलते हैं:
इसका मतलब है कि चूँकि मुनाफ़िक़ों ने ग़ज़वा-ए-तबूक से दूर रहना पसंद किया, अब वे आगे की जंगों से हमेशा के लिए महरूम रहेंगे। उन्हें किसी भी आने वाली जंग में शामिल होने की इजाज़त नहीं मिलेगी।
यह हमें सिखाता है कि जो नबी ﷺ की मुबारक सोहबत से मुँह मोड़ लेता है, वह उससे फ़ायदा नहीं उठा सकता। चमगादड़ सूरज की रोशनी कभी हासिल नहीं कर सकता।
हालाँकि जो लोग बरकत लेने के शौक़ीन हैं, वे अपनी हैसियत के मुताबिक़ बरकतें हासिल करते रहते हैं। बिजली की ताक़त एक जैसी होती है, लेकिन उसकी रोशनी बल्ब के वॉट के हिसाब से अलग-अलग दिखती है। इसी तरह नबी ﷺ की सोहबत सबके लिए एक जैसी थी, लेकिन बरकत लेने की क़ाबिलियत अलग-अलग थी — जैसा हज़रत अबू बकर सिद्दीक़, हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.) और दूसरों के हाल से ज़ाहिर है।
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