Transliteration: (Farihal mukhallafoona bimaq'adihim khilaafa Rasoolil laahi wa karihooo ai yujaahidoo bi amwaalihim wa anfusihim fee sabeelil laahi wa qaaloo laa tanfiroo fil harr; qul Naaru jahannama ashaddu harraa; law kaanoo yafqahoon)
इन मुनाफ़िक़ों ने बहाने बनाकर ग़ज़वा-ए-तबूक से ख़ुशी-ख़ुशी दूर रहे। इससे साफ़ है कि किसी गुनाह पर फ़ख़्र के साथ ख़ुशी ज़ाहिर करना कुफ़्र है, और नबी करीम ﷺ से आराम और मुश्किल दोनों हालात में दूर रहना मोमिन की शान नहीं।
नबी ﷺ की ख़ुशी पर ख़ुशी ज़ाहिर करना ईमान का हिस्सा है। "तो वे ख़ुश हों" (सूरा यूनुस 10:58) के मुताबिक़।
इससे हम सीखते हैं कि ईमान की नेमत इंसान में नेक कामों की जुर्रत पैदा करती है, जबकि कुफ़्र और निफ़ाक़ इंसान को बुज़दिल बना देते हैं।
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया कि ईशा और फ़ज्र की नमाज़ मुनाफ़िक़ों पर बहुत भारी होती है। अल्लाह फ़रमाता है: "हम जल्द ही उसे मुश्किल की तरफ़ ले जाएँगे" (सूरा लैल 92:10)। जो नेक कामों को भारी और बुरे कामों को आसान समझे, वह मुनाफ़िक़ है। अल्लाह हमें इससे बचाए। आमीन।
ग़ज़वा-ए-तबूक के मौके पर मौसम और जंग की जगह दोनों बहुत गर्म थे। ये अल्फ़ाज़ मुनाफ़िक़ों ने उस वक़्त कहे जब वक़्त और जगह की गर्मी सख़्त थी।
जहन्नम की आग को सिर्फ़ दो चीज़ें बुझा सकती हैं: अल्लाह के ख़ौफ़ में बहाए गए मोमिन के आँसू, और अल्लाह की राह में जमी हुई मोमिन के जिस्म की गर्द — जैसे जिहाद, इल्म हासिल करने या हज के सफ़र से।
रूहुल बयान के मुफ़स्सिर बयान करते हैं कि ग़ज़वा-ए-तबूक के दौरान अबू ख़शीमा दोपहर को सफ़र से लौटा तो उसे अपने बाग़ में ठंडा पानी, गर्म रोटी और ख़ूबसूरत बीवियाँ मिलीं। यह देखकर उसने कहा: "यह इंसाफ़ के ख़िलाफ़ है कि अल्लाह का रसूल जलती हुई रेत में तकलीफ़ झेल रहा हो और मैं ठंडे पानी और गर्म रोटी के आराम में हूँ।" वह उसी हालत में तलवार लेकर फ़ौरन निकल पड़ा और नबी ﷺ के मुबारक क़दमों में हाज़िर हुआ।
यही नेक सहाबा हैं जिनके तवस्सुल से अल्लाह हम जैसे लाखों गुनाहगारों को माफ़ करेगा।
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