Transliteration: (Allazeena yalmizoonal mut tawwi'eena minalmu'mineena fis sadaqaati wallazeena laa yajidoona illaa juhdahum fayaskharoona minhum sakhiral laahu minhum wa lahum azaabun aleem)
यह आयत उस वक़्त नाज़िल हुई जब मुनाफ़िक़ों ने नबी ﷺ के नेक सहाबा का मज़ाक उड़ाया — जो बड़ी रक़में सदक़ा देते थे उन्हें रियाकार कहा गया, और जो कम देते थे उन्हें ताना मारा गया कि अल्लाह को तुम्हारे माल की ज़रूरत नहीं।
यह उन आलोचकों (जैसे रफ़ज़ी) के लिए सबक़ है जो सहाबा की इबादत और सदक़े पर निफ़ाक़ का इल्ज़ाम लगाते हैं। ऐसा ऐब लगाना और ताना मारना मुनाफ़िक़ों का रवैया है।
हज़रत अबू अक़ील अन्सारी पूरी रात की मेहनत के बाद सिर्फ़ एक साअ (तक़रीबन 4 किलो) खजूर लाए, फिर भी नबी ﷺ ने उन्हें ख़ुशी से क़बूल किया। यह दिखाता है कि अल्लाह के नज़दीक सदक़े की तादाद से बढ़कर दिल की सच्चाई की क़द्र है।
अल्लाह के नेक बंदों का मज़ाक उड़ाना, इल्ज़ाम लगाना या ताना मारना अल्लाह की ही मुख़ालिफ़त है, और अल्लाह ऐसा करने वालों को दर्दनाक अज़ाब देगा।
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