Transliteration: (Fa a'qabahum nifaaqan fee quloobihim ilaa Yawmi yalqaw nahoo bimaaa akhlaful laaha maa wa'adoohu wa bimaa kaanoo yak ziboon)
इससे मुराद मौत तक है, क्योंकि मौत के बाद बरज़ख़ (क़ब्र की दुनिया) में न कोई काफ़िर बचेगा न मुनाफ़िक़। मौत के बाद सब ईमान लाएँगे, लेकिन उनका ईमान क़बूल नहीं होगा।
इससे हम जानते हैं कि सअ़्लबा का निफ़ाक़ और इर्तिदाद पर मरना यक़ीनी और साबित है। उसका बार-बार ज़कात के साथ आना निफ़ाक़ी था और उसमें सच्चाई नहीं थी। यही वजह है कि नबी ﷺ और दोनों ख़लीफ़ों ने उसका माल क़बूल नहीं किया। अगर वह सच्ची तौबा के साथ लाता, तो ज़रूर क़बूल होता, क्योंकि कुफ़्र से तौबा भी क़बूल होती है।
यह सिखाता है कि कुछ गुनाह ईमान में कमज़ोरी का सबब बनते हैं। फ़रावानी में अल्लाह को भुला देना, अहद पूरे न करना और नज़्र (प्रार्थना का वादा) छोड़ देना — ये सब निफ़ाक़ की निशानियाँ हैं।
इसके अलावा, अल्लाह की तरफ़ से सबसे बड़ी सज़ा नेकी और ईमान से महरूमी है। कभी-कभी दुनियावी मुसीबतें अल्लाह की रहमत होती हैं।
हम यह भी सीखते हैं कि नबी करीम ﷺ से किया गया वादा अल्लाह से किया गया वादा है, जैसा कि सअ़्लबा ने नबी ﷺ से वादा किया था।
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