Transliteration: (Falammaaa aataahum min fadlihee bakhiloo bihee wa tawallaw wa hum mu'ridoon)
यह आयत सअ़्लबा बिन हातिब के बारे में नाज़िल हुई, जो शुरू में ग़रीब था। उसने नबी करीम ﷺ से दुआ की कि वह उसे मालदार कर दे। नबी ﷺ ने नसीहत की कि उसके लिए ग़रीबी बेहतर है।
सअ़्लबा ने क़सम खाई कि अगर वह मालदार हुआ, तो अल्लाह का खूब शुक्र अदा करेगा।
इसके जवाब में नबी ﷺ ने उसके लिए दुआ की, और अल्लाह ने उसे भेड़ों की इतनी फ़रावानी दी कि वे सब मदीना में नहीं समा सकती थीं।
लेकिन सअ़्लबा फिर अपनी भेड़ें लेकर जंगल में चला गया, जिससे वह जमाअत की नमाज़ से महरूम हो गया। वह ज़कात के निज़ाम से इनकार करने लगा। जब नबी ﷺ ने उसके पास ज़कात का वसूल करने वाला भेजा, तो उसने ज़कात को सख़्त टैक्स बताकर शिकायत की और अदा करने में देर की। यह बात नबी ﷺ तक पहुँची, तो आपने उसकी ज़कात क़बूल करने से इनकार कर दिया।
बाद में हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ और हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.) के दौरे-ख़िलाफ़त में भी उसकी ज़कात रद्द हुई। आख़िर में हज़रत उस्मान (रज़ि.) के दौर में सअ़्लबा मुर्तद होकर मरा।
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