कुरान - 9:80 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

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ٱسۡتَغۡفِرۡ لَهُمۡ أَوۡ لَا تَسۡتَغۡفِرۡ لَهُمۡ إِن تَسۡتَغۡفِرۡ لَهُمۡ سَبۡعِينَ مَرَّةٗ فَلَن يَغۡفِرَ ٱللَّهُ لَهُمۡۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمۡ كَفَرُواْ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦۗ وَٱللَّهُ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلۡفَٰسِقِينَ,

Transliteration: (istaghfir lahum aw laa tastaghfir lahum in tastaghfir lahum sab'eena marratan falany yaghfiral laahu lahum; zaalika bi annahum kafaroo billaahi wa Rasoolih; wallaahu laa yahdil qawmal faasiqeen)

(ऐ नबी ﷺ) चाहे आप उनके लिए माफ़ी माँगें [220] या न माँगें, (बराबर है)। अगर आप उनके लिए सत्तर बार माफ़ी माँगें, तो भी अल्लाह उन्हें हरगिज़ नहीं [221] माफ़ करेगा। यह इसलिए कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का इनकार [222] किया। और अल्लाह नाफ़रमान लोगों को हिदायत नहीं देता [223]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 80 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 80 की तफ़्सीर

✅ [220] मुनाफ़िक़ों के लिए माफ़ी माँगने से रोक

उस वक़्त तक मुनाफ़िक़ों के लिए माफ़ी की दुआ करना मना नहीं था। बाद में यह मनाही इस आयत से आई: "और उनमें से किसी की मौत पर कभी नमाज़ न पढ़ना" (सूरा अत-तौबा 9:84)। यहाँ "सत्तर बार" की तादाद तक ही हद नहीं, बल्कि इससे कहीं ज़्यादा मुराद है।

✅ [221] न माफ़ होने की वजह

न माफ़ होने की वजह यह है कि उन्होंने अल्लाह और उसके महबूब रसूल ﷺ का इनकार किया। अगर नबी करीम ﷺ अपनी बेपनाह रहमत से उनके लिए दुआ भी करें, तो अल्लाह उन्हें माफ़ नहीं करेगा।

अल्लाह अपने महबूब रसूल के दुश्मनों के जन्नत में दाख़िल होने की ख्वाहिश नहीं रखता। यह नबी करीम ﷺ के बुलंद मुक़ाम को दर्शाता है — महबूब से मोहब्बत अपने आप पैदा होती है, लेकिन मोहब्बत का तक़ाज़ा यह है कि महबूब के दुश्मन माफ़ न किए जाएँ।

✅ [222] रसूल का इनकार अल्लाह का इनकार

इससे दो बातें निकलती हैं:

  • काफ़िर को किसी की माफ़ी की दुआ फ़ायदा नहीं देगी, क्योंकि उसकी माफ़ी मुमकिन ही नहीं।
  • नबी ﷺ के किसी भी नेक सहाबी का इनकार रसूल ﷺ का इनकार है, और रसूल ﷺ का इनकार अल्लाह का इनकार है। मुनाफ़िक़ों ने नेक सहाबा का मज़ाक उड़ाया, और अल्लाह ने फ़रमाया: "उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का इनकार किया।"

✅ [223] मुनाफ़िक़ों की माफ़ी की दरख़्वास्त

इसके बाद मुनाफ़िक़ों ने नबी ﷺ से माफ़ी माँगी और दुआ की दरख़्वास्त की। उसी वक़्त यह पूरी आयत नाज़िल हुई।

इस्लाम के उलमा कहते हैं कि जो नबी करीम ﷺ की इज़्ज़त और शान की बेअदबी करे, उसकी तौबा अदालत में क़बूल नहीं होती। यह आयत इस मामले की दलील की तरफ़ इशारा करती है।

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