Transliteration: (istaghfir lahum aw laa tastaghfir lahum in tastaghfir lahum sab'eena marratan falany yaghfiral laahu lahum; zaalika bi annahum kafaroo billaahi wa Rasoolih; wallaahu laa yahdil qawmal faasiqeen)
उस वक़्त तक मुनाफ़िक़ों के लिए माफ़ी की दुआ करना मना नहीं था। बाद में यह मनाही इस आयत से आई: "और उनमें से किसी की मौत पर कभी नमाज़ न पढ़ना" (सूरा अत-तौबा 9:84)। यहाँ "सत्तर बार" की तादाद तक ही हद नहीं, बल्कि इससे कहीं ज़्यादा मुराद है।
न माफ़ होने की वजह यह है कि उन्होंने अल्लाह और उसके महबूब रसूल ﷺ का इनकार किया। अगर नबी करीम ﷺ अपनी बेपनाह रहमत से उनके लिए दुआ भी करें, तो अल्लाह उन्हें माफ़ नहीं करेगा।
अल्लाह अपने महबूब रसूल के दुश्मनों के जन्नत में दाख़िल होने की ख्वाहिश नहीं रखता। यह नबी करीम ﷺ के बुलंद मुक़ाम को दर्शाता है — महबूब से मोहब्बत अपने आप पैदा होती है, लेकिन मोहब्बत का तक़ाज़ा यह है कि महबूब के दुश्मन माफ़ न किए जाएँ।
इससे दो बातें निकलती हैं:
इसके बाद मुनाफ़िक़ों ने नबी ﷺ से माफ़ी माँगी और दुआ की दरख़्वास्त की। उसी वक़्त यह पूरी आयत नाज़िल हुई।
इस्लाम के उलमा कहते हैं कि जो नबी करीम ﷺ की इज़्ज़त और शान की बेअदबी करे, उसकी तौबा अदालत में क़बूल नहीं होती। यह आयत इस मामले की दलील की तरफ़ इशारा करती है।
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