कुरान - 9:96 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

96
يَحۡلِفُونَ لَكُمۡ لِتَرۡضَوۡاْ عَنۡهُمۡۖ فَإِن تَرۡضَوۡاْ عَنۡهُمۡ فَإِنَّ ٱللَّهَ لَا يَرۡضَىٰ عَنِ ٱلۡقَوۡمِ ٱلۡفَٰسِقِينَ,

Transliteration: (Yahlifoona lakum litardaw 'anhum fa in tardaw 'anhum fa innal laaha laa yardaa 'anil qawmil faasiqeen)

वे तुम्हारे सामने क़समें खाते हैं ताकि तुम उनसे राज़ी [265] हो जाओ। मगर अगर तुम उनसे राज़ी भी हो जाओ, तो बेशक अल्लाह नाफ़रमान लोगों [266] से राज़ी नहीं होता। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 96 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 96 की तफ़्सीर

✅ [265] मुनाफ़िक़ लोगों की रज़ा के लिए आमाल करते हैं

यह आयत सिखाती है कि मुनाफ़िक़ नेक काम अल्लाह की रज़ा के लिए नहीं, बल्कि दूसरों को ख़ुश करने और उनकी मंज़ूरी हासिल करने के लिए करते हैं। इसके उलट मोमिन हर काम सिर्फ़ अल्लाह तआला की रज़ा के लिए करता है। रिया (लोगों को दिखाने के लिए नेकी करना) अमल में निफ़ाक़ की निशानी है। मोमिन की नीयत पाक होती है — उसका मक़सद अल्लाह की रज़ा होती है, लोगों की तारीफ़ या पहचान हासिल करना नहीं।

✅ [266] मुनाफ़िक़ों को ख़ुश करने की नाकारगी

यह आयत मुसलमानों को सम्बोधित करती है और याद दिलाती है कि मुनाफ़िक़ों की झूठी क़समों की बिना पर उन्हें मंज़ूर करना किसी काम का नहीं। असल में रसूल अल्लाह ﷺ की मंज़ूरी अहम है। अगर अल्लाह किसी से राज़ी है तो रसूल ﷺ भी उससे राज़ी होंगे, और इसके उलट। अल्लाह फ़रमाता है: "फिर मेरी पैरवी करो, अल्लाह तुमसे मुहब्बत करेगा" (सूरा 3:31)। यह बताता है कि असली रज़ा अल्लाह को राज़ी करने में है, मुनाफ़िक़ों की मंज़ूरी हासिल करने में नहीं।

यह यह भी सिखाता है कि अगर मुसलमान काफ़िरों या मुनाफ़िक़ों के धोखे में आ जाएँ, तो उन पर गुनाह नहीं है, क्योंकि आयत उन्हें भटक जाने पर मलामत नहीं करती। मगर उन्हें ख़बरदार रहना चाहिए कि वे उन लोगों की मंज़ूरी न चाहें जिनके आमाल सच्चे नहीं हैं।

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