कुरान - 9:98 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

98
وَمِنَ ٱلۡأَعۡرَابِ مَن يَتَّخِذُ مَا يُنفِقُ مَغۡرَمٗا وَيَتَرَبَّصُ بِكُمُ ٱلدَّوَآئِرَۚ عَلَيۡهِمۡ دَآئِرَةُ ٱلسَّوۡءِۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٞ,

Transliteration: (Wa minal A'raabi mai yattakhizu maa yunfiqu maghramanw wa yatarabbasu bikumud dawaaa'ir; alaihim daaa'iratus saw'; wallaahu Samee'un 'Aleem)

और गाँव के रहने वालों में [269] कुछ ऐसे हैं जो अल्लाह की राह में ख़र्च किए हुए माल को जुर्माना [270] समझते हैं और तुम पर मुसीबतों [271] के आने का इंतज़ार करते हैं। बुरी मुसीबत उन्हीं पर है। और अल्लाह सब कुछ सुनने वाला, जानने वाला है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 98 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 98 की तफ़्सीर

✅ [269] "गाँव के रहने वाले" का मतलब

इस मौके पर "गाँव के रहने वाले" (अराब) से तमाम अरब मुराद नहीं, बल्कि ख़ास तौर पर वे लोग मुराद हैं जो दियारी (बद्दू) इलाक़ों में रहते थे, अरब के शहरी बाशिंदों के मुक़ाबले में। अल्फ़ाज़ "अराब" ख़ास तौर पर बद्दुओं और अरब के दूर-दराज़ दियारी इलाक़ों के लोगों के लिए इस्तेमाल होता है। ये लोग अपने माहौल और ज़िंदगी की वजह से कभी-कभी दीनी तालीमात और ज़्यादा शहरी इलाक़ों के मआशरती उसूलों से दूर रहते थे।

✅ [270] महसूल की तरह दी गई ख़ैरात

आयत कुछ बद्दुओं की तरफ़ इशारा करती है जो ख़ैरात और हज पर ख़र्च तो करते थे, मगर नाराज़गी के साथ — जैसे वह महसूल हो। वे दिली ख़ुशी और सख़ावत से नहीं, बल्कि मजबूरी की वजह से देते थे। सिर्फ़ वह ख़ैरात अल्लाह की बारगाह में क़बूल है जो सच्चाई और दिल से दी जाए, अल्लाह की रज़ा की ख्वाहिश के साथ। जो ख़ैरात नाराज़गी या बुरी नीयत से दी जाए, वह अल्लाह के नज़दीक क़ीमती नहीं।

✅ [271] मुसलमानों की मुसीबतों का इंतज़ार

इन बद्दुओं का हाल यह बताया गया कि वे मुसलमानों पर मुसीबतों के आने का इंतज़ार करते थे, मुसलमानों की क़ुव्वत के ज़वाल की उम्मीद रखते थे ताकि वे उसका फ़ायदा उठा सकें। वे मुसलमानों की शिकस्त चाहते थे ताकि उन पर ग़ालिब आ सकें।

शान-ए-नुज़ूल: यह आयत ख़ास तौर पर असद, ग़तफ़ान और तमीम क़बीलों के गाँव के रहने वालों के बारे में उतरी। यह एक पेशनगोई थी कि मुसीबत उन्हीं पर आएगी, मोमिनों पर नहीं, और वे हमेशा ज़ेर और ग़ुलाम रहेंगे। जो लोग अल्लाह के नेक बंदों को हक़ीर जानते हैं, वे हमेशा रुसवाई और मुसीबत में रहते हैं, जैसा तारीख़ ने बार-बार दिखाया है। यह याद दिलाता है कि जो लोग अल्लाह की हिदायत के हक़दार पैरवीकारों के मुख़ालिफ़ होते हैं और जो मग़रूर रहते हैं, उन्हें अज़ाब और रुसवाई का सामना करना पड़ता है।

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