कुरान - 9:106 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

106
وَءَاخَرُونَ مُرۡجَوۡنَ لِأَمۡرِ ٱللَّهِ إِمَّا يُعَذِّبُهُمۡ وَإِمَّا يَتُوبُ عَلَيۡهِمۡۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٞ,

Transliteration: (Wa aakharoona murjawna li amril laahi immaa yu'azzibuhum wa immaa yatoobu 'alaihim; wallaahu 'Aleemun Hakeem)

और कुछ दूसरे लोग अल्लाह के हुक्म के इंतज़ार में रोके गए हैं, कि वह उन्हें अज़ाब दे [293] या उनकी तौबा क़बूल करे [294]। और अल्लाह सब कुछ जानने वाला, हिकमत वाला है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 106 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 106 की तफ़्सीर

✅ [293] जंग से पीछे रहने वालों का तीसरा गिरोह

यह आयत उन लोगों की तीसरी क़िस्म के बारे में है जो ग़ज़वा-ए-तबूक से पीछे रह गए। पीछे रहने वालों के तीन अलग गिरोह थे:

  • मुनाफ़िक़: जिन्होंने झूठे बहाने बनाए और उनकी शिरकत की कोई नीयत ही नहीं थी।
  • सच्चे मोमिन: जिन्होंने जंग से पीछे रहने के तुरंत बाद तौबा की।
  • वे जिनकी तौबा देर से हुई: और जो अल्लाह के हुक्म के इंतज़ार में छोड़ दिए गए।

यह आयत तीसरे गिरोह के बारे में है — सच्चे मोमिन जिन्होंने तौबा में देर की, इसलिए उन्हें इंतज़ार में रखा गया कि अल्लाह उन्हें अज़ाब देगा या उनकी तौबा क़बूल करेगा।

✅ [294] तौबा की क़ुबूलियत में देरी

"उनकी तौबा क़बूल न करना" से मुराद यह है कि उन्हें सच्ची और दिली तौबा करने की फ़ौरी तौफ़ीक़ नहीं दी गई। यह सिखाता है कि दुआ की तरह तौबा की क़ुबूलियत भी अल्लाह की हिकमत पर मबनी वजहों से देर से हो सकती है।

इसकी मशहूर मिसाल हज़रत काब बिन मालिक (रज़ि.) और उनके साथियों का मामला है, जिनकी तौबा काफ़ी देर के बाद क़बूल हुई। यह दिखाता है कि सच्ची तौबा भी आज़माइश और इंतज़ार के दौर से गुज़र सकती है, और मोमिनों को सब्र, सच्चाई और अल्लाह की हिकमत पर भरोसे की अहमियत याद दिलाती है।

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