Transliteration: (Wa aakharoona murjawna li amril laahi immaa yu'azzibuhum wa immaa yatoobu 'alaihim; wallaahu 'Aleemun Hakeem)
यह आयत उन लोगों की तीसरी क़िस्म के बारे में है जो ग़ज़वा-ए-तबूक से पीछे रह गए। पीछे रहने वालों के तीन अलग गिरोह थे:
यह आयत तीसरे गिरोह के बारे में है — सच्चे मोमिन जिन्होंने तौबा में देर की, इसलिए उन्हें इंतज़ार में रखा गया कि अल्लाह उन्हें अज़ाब देगा या उनकी तौबा क़बूल करेगा।
"उनकी तौबा क़बूल न करना" से मुराद यह है कि उन्हें सच्ची और दिली तौबा करने की फ़ौरी तौफ़ीक़ नहीं दी गई। यह सिखाता है कि दुआ की तरह तौबा की क़ुबूलियत भी अल्लाह की हिकमत पर मबनी वजहों से देर से हो सकती है।
इसकी मशहूर मिसाल हज़रत काब बिन मालिक (रज़ि.) और उनके साथियों का मामला है, जिनकी तौबा काफ़ी देर के बाद क़बूल हुई। यह दिखाता है कि सच्ची तौबा भी आज़माइश और इंतज़ार के दौर से गुज़र सकती है, और मोमिनों को सब्र, सच्चाई और अल्लाह की हिकमत पर भरोसे की अहमियत याद दिलाती है।
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