Transliteration: (Laa taqum feehi abadaa; lamasjidun ussisa 'alat taqwaa min awwali yawmin ahaqqu 'an taqooma feeh; feehi rijaaluny yuhibbona 'any yata tah haroo; wallaahu yuhibbul muttah hireen)
यह आयत नबी ﷺ को हुक्म देती है कि मुनाफ़िक़ों द्वारा बनाई गई मस्जिद (मस्जिद-ए-ज़िरार) में खड़े न हों। इससे समझा जाता है कि काफ़िरों, मुनाफ़िक़ों या मुर्तदों द्वारा बनाई या चलाई जाने वाली मस्जिदों में नमाज़ नहीं पढ़नी चाहिए, चाहे वे क़ानूनी तौर पर वक्फ़ ही क्यों न हों, क्योंकि वे इस्लामी मस्जिदें नहीं हैं और उनका वक्फ़ दीनी तौर पर दुरुस्त नहीं।
मगर अगर कोई काफ़िर किसी मुसलमान को माल दे और मालिकी क़ानूनी तौर पर मुंतक़िल हो जाए, तो उस माल से मस्जिद बनाना जायज़ हो जाता है, क्योंकि जायज़ मालिकी हुक्म बदल देती है।
तफ़्सीर-ए-मदारिक के मुताबिक़ अगर मस्जिद शेख़ी, दिखावे या सियासी मक़सद से, या नाजायज़ माल से बनाई जाए, तो वह भी मस्जिद-ए-ज़िरार के हुक्म में मानी जाती है। इसलिए मस्जिदें सच्ची नीयत और पाक, जायज़ कमाई से बनाई जानी चाहिए।
इससे मुराद मस्जिद-ए-क़ुबा है, जो मदीना के पुराने इलाक़े में, नए शहर के मरकज़ से करीब तीन मील दूर स्थित है। नबी करीम ﷺ ने ख़ुद इसकी बुनियाद रखी, और क़ुबा में क़ियाम के दौरान वहाँ नियमित रूप से नमाज़ अदा करते रहे। मदीना मुंतक़िल होने के बाद भी नबी ﷺ हर हफ़्ते (सनीचर) मस्जिद-ए-क़ुबा की ज़ियारत करते थे। सहीह हदीस के मुताबिक़ मस्जिद-ए-क़ुबा में नमाज़ पढ़ना एक उमरा के बराबर है। कुछ उलेमा का कहना है कि यह आयत मस्जिद-ए-नबवी की तरफ़ इशारा करती है, मगर मज़बूत राय यह है कि इससे मस्जिद-ए-क़ुबा मुराद है।
आयत का यह हिस्सा बताता है कि मस्जिद-ए-क़ुबा नेक लोगों से भरी है, जो दिखाता है कि नेक लोगों से भरी मस्जिद दूसरी मस्जिदों से ज़्यादा फ़ज़ीलत रखती है। मस्जिद-ए-क़ुबा की फ़ज़ीलत सिर्फ़ इमारत में नहीं, बल्कि उसके लोगों की रूहानी पाकी की वजह से भी है।
यह आयत मस्जिद-ए-क़ुबा के लोगों की तारीफ़ में उतरी, ख़ास तौर पर उनके तहारत (पाकी) पर ज़ोर देने की वजह से। जब यह आयत उतरी, तो सहाबा ने नबी ﷺ से उनकी तारीफ़ की गई पाकी के मायने पूछे।
उन्होंने जवाब दिया कि वे इस्तिन्जा (हाजत से फ़ारिग होकर सफ़ाई) के लिए पहले मिट्टी और फिर पानी इस्तेमाल करते थे। नबी ﷺ ने उनके तरीक़े को मंज़ूर किया, और अपनी सुन्नत के मुताबिक़ होने की तस्दीक़ की।
जैसा ख़ज़ाइनुल इरफ़ान में बयान है, पहले मिट्टी फिर पानी इस्तेमाल करना नबी ﷺ की सुन्नत थी, जिसे आपने कभी नहीं छोड़ा। अगर नापाकी एक दरहम (चाँदी का सिक्का) के सिक्के के साइज़ से ज़्यादा हो, तो पानी से धोना फ़र्ज़ है, और अगर उससे कम हो, तो मुस्तहब (पसंदीदा) है।
यह आयत सिखाती है कि इस्लाम में जिस्मानी और रूहानी दोनों पाकी को बहुत इज़्ज़त दी गई है, और इबादत में सच्चाई और पाकी मस्जिद और उसके लोगों दोनों का मरतबा बुलंद करती है।
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