Transliteration: (Afaman assasa bunyaanahoo 'alaa taqwaa minal laahi wa ridwaanin khairun am man assasa bunyaanahoo 'alaa shafaa jurufin haarin fanhaara bihee fee Naari Jahannam; wallaahu laa yahdil qawmaz zaalimeen)
इससे मुराद मस्जिद-ए-क़ुबा के अंसार हैं, जिन्होंने अपनी मस्जिद तक़वा (अल्लाह के डर) और उसकी रज़ा के तलब पर क़ायम की। इस आयत के मुताबिक़ उनके ईमान, सच्चाई और नेकी की तस्दीक़ क़ुरआन-ए-करीम ने कर दी है। उनके ईमान, आमाल और ख़ुद मस्जिद की बुनियाद सच्ची ख़ुदातरसी पर रखी गई थी। इसलिए इन सहाबा के ईमान या नेकी में शक करना क़ुरआन की गवाही को रद्द करने के बराबर है, जो उनकी पाकी और मक़सद की तस्दीक़ करती है।
यह मुनाफ़िक़ों की तरफ़ इशारा है जिन्होंने मस्जिद-ए-ज़िरार बनाई — एक इमारत जो धोखे, छिपे हुए कुफ़्र और सियासी साज़िश पर खड़ी की गई थी। उनका ईमान का दावा, उनकी ज़ाहिरी नमाज़ और रोज़े, और ख़ुद वह मस्जिद — सब उस गिरती हुई खाई के किनारे पर बनाए जाने की मिसाल है — एक ऐसी बुनियाद जो अस्थिर और खोखली है, और जहन्नम की आग में गिरने वाली है।
यह आयत एक ज़बरदस्त मुक़ाबला पेश करती है: जैसे कमज़ोर ज़मीन पर बनी इमारत गिरने वाली होती है, वैसे ही मुनाफ़िक़ों के आमाल भी गिरने वाले हैं। हज़रत जाबिर (रज़ि.) के मुताबिक़ जब नबी ﷺ के हुक्म पर मस्जिद-ए-ज़िरार गिराई जा रही थी, तो उसमें से जहन्नम का धुआँ उठता दिखाई दिया (तफ़्सीर रूहुल बयान)। यह तस्वीर दिखाती है कि जिन आमाल में सच्चाई नहीं होती, वे उन इमारतों की तरह होते हैं जो रूहानी तौर पर और आख़िर में जहन्नम में गिरने वाली हैं।
यह आयत एक अहम सबक़ सिखाती है: किसी की नेकी का अंदाज़ा सिर्फ़ ज़ाहिरी हालत या फ़सीह बयानी से नहीं लगाना चाहिए। हर चीज़ जो सतह पर अच्छी दिखती है, वह सच में क़ीमती नहीं होती — हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती। सच्ची सच्चाई और ख़ुदातरसी ही वह बुनियाद है जिस पर नेक आमाल और इमारतें अल्लाह की बारगाह में क़बूल होती हैं। निफ़ाक़, चाहे कितनी भी अच्छी तरह छिपाया जाए, आख़िर में तबाही की तरफ़ ले जाता है।
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