Transliteration: (Innal laahash taraa minal mu'mineena anfusahum wa amwaalahum bi anna lahumul jannah; yuqaatiloona fee sabeelil laahi fa yaqtuloona wa yuqtaloona wa'dan 'alaihi haqqan fit Tawraati wal Injeeli wal Qur'aaan; wa man awfaa bi'ahdihee minal laah; fastabshiroo bi bay'ikumul lazee baaya'tum bih; wa zaalika huwal fawzul 'azeem)
यह आयत मालिक और बंदे के बीच सौदे की जवाज़ की तस्दीक़ करती है, क्योंकि अल्लाह ने ख़ुद मोमिनों की जानें और माल जन्नत के बदले ख़रीद लिए हैं। यह इलाही मुआहिदा मोमिनों को दी गई बेपनाह इज़्ज़त दिखाता है।
शान-ए-नुज़ूल: जब अंसार का एक गिरोह इस्लाम लाया, तो उन्होंने नबी ﷺ से अपने, अल्लाह और नबी ﷺ के बीच शर्तें मुक़र्रर करने की दरख़ास्त की। नबी ﷺ ने फ़रमाया कि अल्लाह के साथ शर्त तौहीद है (कि उसके सिवा किसी की इबादत न करें), और मेरे साथ शर्त यह है कि मेरे साथ वैसा ही सुलूक करें जैसा अपने साथ करते हैं। जब उन्होंने पूछा कि बदले में क्या मिलेगा, तो नबी ﷺ ने फ़रमाया: "जन्नत।" उन्होंने जवाब दिया: "यह बहुत नफ़े वाला सौदा है," जिस पर यह आयत उतरी। (रूहुल बयान)
यह आयत तस्दीक़ करती है कि हर मोमिन को वक़्त आने पर अल्लाह की राह में जंग के लिए तैयार रहना चाहिए। जो अल्लाह के दीन के लिए अपनी जान और माल दे देता है, वह जन्नत का हक़दार है। मुस्लिम मुजाहिद — ज़िंदगी में भी और शहादत में भी — जन्नत का मालिक माना जाता है, और क़यामत के दिन उस मालिकी का दावा करेगा।
यह आयत याद दिलाती है कि अल्लाह की राह में जंग का इनाम सिर्फ़ इस्लाम तक महदूद नहीं — यह तौरात, इंजील और क़ुरआन तीनों में मौजूद है। हक़ और अदल के लिए जद्दोजहद करने का उसूल हज़रत मूसा (अलै.) और हज़रत ईसा (अलै.) के दीन में भी माना गया है। तमाम ज़मानों के मुजाहिदीन इसी इलाही वादे के तहत मुत्तहिद हैं।
मोमिनों को हुक्म दिया गया है कि वे इस बरकत वाले सौदे पर ख़ुशी मनाएँ — दुनिया की ज़िंदगी को जन्नत के हमेशा के इनाम के बदले क़ुर्बान करना। इंसान को ख़ुशी के साथ जिहाद पर जाना चाहिए, जैसे दूल्हा अपनी शादी की तरफ़ जाता है। हज़रत ज़रार बिन अज़दर (रज़ि.) बगै़र ज़िरह (बकतर) के जंगों में शिरकत करते थे, शहादत के शौक़ीन होकर।
आज भी कुछ मुसलमान जंग की तैयारी में ग़ुस्ल करते हैं, साफ़ कपड़े पहनते हैं, ख़ुशबू लगाते हैं और ईद की ख़ुशी के साथ जाते हैं — यह इस आयत की तरफ़दारी है कि इस अमल को ख़ुशी और यक़ीन के साथ किया जाए।
उस कामयाबी से बड़ी कामयाबी क्या होगी जिसमें अल्लाह ख़ुद ख़रीदार हो — उस ज़िंदगी को ख़रीद रहा हो जो उसने दी थी, और बदले में जन्नत पेश कर रहा हो? यह आयत सिखाती है कि अल्लाह की नेमत पर ख़ुशी और शुक्र ज़ाहिर करना सिर्फ़ जायज़ ही नहीं, बल्कि बहुत सराहनीय है, ख़ास तौर पर उनके लिए जो इस सौदे की हमेशा की क़द्र को सच में समझते हैं।
यह सौदा — जहाँ क़ुर्बानी इलाही वादे से मिलती है — सबसे बड़ी फ़तह कहलाई गई है, और मोमिनों को तरग़ीब दी गई है कि वे अपने इलाही मुआहिदे को पूरा करने में ताक़त, इत्मिनान और फ़ख़्र महसूस करें।
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