Transliteration: (Fa in taaboo wa aqaamus Salaata wa aatawuz Zakaata fa ikhwaanukum fid deen; wa nufassilul Aayaati liqawminy ya'lamoon)
आयत का यह हिस्सा सच्ची तौबा की तीन ज़रूरी निशानियाँ बताता है:
तफ़्सीर रूहुल बयान के अनुसार "नमाज़ क़ायम करना" का मतलब कभी-कभार पढ़ना नहीं, बल्कि लगातार और सही तरीक़े से नमाज़ को अदा करना है — ईमान और अमल दोनों में — उसे इस्लाम का बुनियादी सुतून समझते हुए।
जब कोई काफ़िर तौबा करके नमाज़ और ज़कात की शर्तें पूरी करता है, तो वह मुसलमान भाई माना जाता है, विश्वव्यापी इस्लामी भाईचारे का हिस्सा। इससे कई उसूल निकलते हैं:
अल्लाह फ़रमाता है कि वह अपनी आयतें इल्म रखने वालों के लिए खोलकर बयान करता है। इससे दो बातें मालूम होती हैं:
जैसा कि मिसाल है: "जवाहिरात (मोती) ज़रगर (जौहरी) की दुकान से मिलते हैं, समंदर से नहीं।"
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