Transliteration: (Laa yarquboona fee mu'minin illanw wa laa zimmah wa ulaaa 'ika humulmu 'tadoon)
यह आयत उन काफ़िरों की बेरहमी पर ज़ोर देती है जिन्होंने अहद तोड़े और मोमिनों के साथ मामले में न किसी रिश्ते की परवाह की और न किसी समझौते का लिहाज़ किया। उनका रवैया — दुनियावी लालच और हक़ को बिगाड़ने की ख्वाहिश से पैदा — इन कामों पर मुश्तमिल था:
ये काम उन्हें हद से गुज़रने वाला (ज़ालिम) साबित करते हैं — यानी उन्होंने अल्लाह की मुक़र्रर हदें पार कर दीं।
यह आयत एक अख़्लाक़ी चेतावनी भी है: जो लोगों को गुमराह करे, नेक कामों से रोके या गुनाह का मशवरा दे, वह इसी मज़म्मत के दायरे में आता है। इसमें नेक इज्तिमाअतों को नाहक़ रोकना भी शामिल है, जैसे जश्न-ए-मीलादुन्नबी (मीलाद शरीफ़), ख़त्म-ए-ख़्वाजगान और अल्लाह की रज़ा के लिए होने वाली दूसरी रूहानी महफ़िलें। जिहालत या तअस्सुब की वजह से ऐसी कोशिशों को रोकना भी अल्लाह की राह से इनहिराफ़ माना गया है।
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