Transliteration: (Wa in nakasooo aimaanahum mim ba'di 'ahdihim wa ta'anoo fee deenikum faqaatilooo a'immatal kufri innahum laaa aimaana lahum la'allahum yantahoon)
यह आयत उन अहद तोड़ने वाले काफ़िरों के बारे में है जो न सिर्फ़ समझौते तोड़ते हैं, बल्कि इस्लाम की खुल्लम-खुल्ला हँसी और बेअदबी भी करने लगते हैं। इस्लामी मुल्क में अगर कोई ग़ैर-मुस्लिम नागरिक (ज़िम्मी) नबी ﷺ की बेअदबी करे या इस्लामी तालीमात पर खुले तौर पर हमला करे, तो यह पनाह के समझौते की ख़िलाफ़वर्ज़ी माना जाता है। ऐसा रवैया उसकी महफ़ूज़ हैसियत ख़त्म कर देता है और वह सज़ा का मुस्तहिक़ बन जाता है — क़त्ल की सज़ा भी शामिल है — क्योंकि इस्लामी क़द्रों का एहतिराम उसके ठहरने और अमन की शर्त है।
कुफ़्र के सरदारों से जंग का हुक्म इसलिए है, ताकि सभी काफ़िरों को मिटाया न जाए, बल्कि उस क़ियादत को बेअसर किया जाए जो दुश्मनी भड़काती है, अहद तोड़ती है और इस्लाम के ख़िलाफ़ हमलों की अगुआई करती है। उनकी क़समें बेकार हैं, और ऐसे बे-एतिबार दुश्मनों से अमन क़ायम नहीं हो सकता।
यह आयत सिखाती है कि जिहाद का असल मक़सद लोगों को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाना नहीं, बल्कि उन ज़ालिम ताक़तों का ख़ात्मा है जो इस्लामी निज़ाम को चुनौती देती हैं और दुश्मनी फैलाती हैं। जब ये सरदार दब जाते हैं, तो मुसलमानों का ख़तरा ख़त्म होता है और अमन व सुकून क़ायम होता है।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat