कुरान - 9:12 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

12
وَإِن نَّكَثُوٓاْ أَيۡمَٰنَهُم مِّنۢ بَعۡدِ عَهۡدِهِمۡ وَطَعَنُواْ فِي دِينِكُمۡ فَقَٰتِلُوٓاْ أَئِمَّةَ ٱلۡكُفۡرِ إِنَّهُمۡ لَآ أَيۡمَٰنَ لَهُمۡ لَعَلَّهُمۡ يَنتَهُونَ,

Transliteration: (Wa in nakasooo aimaanahum mim ba'di 'ahdihim wa ta'anoo fee deenikum faqaatilooo a'immatal kufri innahum laaa aimaana lahum la'allahum yantahoon)

और अगर वे अपने अहद के बाद क़समें तोड़ें और तुम्हारे दीन की खुल्लम-खुल्ला हँसी उड़ाएँ [26], तो कुफ़्र के सरदारों से जंग करो। बेशक उनकी क़समों का कोई एतिबार नहीं [27]। (ऐसा करो) ताकि वे बाज़ आ जाएँ। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 12 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 12 की तफ़्सीर

✅ [26] इस्लाम की बेअदबी पनाह को ख़त्म कर देती है

यह आयत उन अहद तोड़ने वाले काफ़िरों के बारे में है जो न सिर्फ़ समझौते तोड़ते हैं, बल्कि इस्लाम की खुल्लम-खुल्ला हँसी और बेअदबी भी करने लगते हैं। इस्लामी मुल्क में अगर कोई ग़ैर-मुस्लिम नागरिक (ज़िम्मी) नबी ﷺ की बेअदबी करे या इस्लामी तालीमात पर खुले तौर पर हमला करे, तो यह पनाह के समझौते की ख़िलाफ़वर्ज़ी माना जाता है। ऐसा रवैया उसकी महफ़ूज़ हैसियत ख़त्म कर देता है और वह सज़ा का मुस्तहिक़ बन जाता है — क़त्ल की सज़ा भी शामिल है — क्योंकि इस्लामी क़द्रों का एहतिराम उसके ठहरने और अमन की शर्त है।

✅ [27] जंग का मक़सद: ताक़त को रोकना, ईमान पर मजबूर नहीं करना

कुफ़्र के सरदारों से जंग का हुक्म इसलिए है, ताकि सभी काफ़िरों को मिटाया न जाए, बल्कि उस क़ियादत को बेअसर किया जाए जो दुश्मनी भड़काती है, अहद तोड़ती है और इस्लाम के ख़िलाफ़ हमलों की अगुआई करती है। उनकी क़समें बेकार हैं, और ऐसे बे-एतिबार दुश्मनों से अमन क़ायम नहीं हो सकता।

यह आयत सिखाती है कि जिहाद का असल मक़सद लोगों को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाना नहीं, बल्कि उन ज़ालिम ताक़तों का ख़ात्मा है जो इस्लामी निज़ाम को चुनौती देती हैं और दुश्मनी फैलाती हैं। जब ये सरदार दब जाते हैं, तो मुसलमानों का ख़तरा ख़त्म होता है और अमन व सुकून क़ायम होता है।

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