Transliteration: (Alaa tuqaatiloona qawman nakasooo aimaanahum wa hammoo bi ikhraajir Rasooli wa hum bada'ookum awwala marrah; atakhshawnahum; fallaahu ahaqqu an takhshawhu in kuntum mu'mineen)
यह आयत मोमिनों को चुनौती देती है: उन लोगों से जंग क्यों नहीं करते जिन्होंने अहद तोड़े, ख़ास तौर पर उन्होंने नबी ﷺ को निकालने की साज़िशें कीं और तुम्हारे ख़िलाफ़ जारियत की इब्तिदा की।
इसका इशारा इन गुटों की तरफ़ है:
इन गुटों ने सिर्फ़ बेवफ़ाई नहीं की, बल्कि इस्लाम के वजूद के ख़िलाफ़ अमली क़दम उठाए।
यह आयत उन लोगों के ख़िलाफ़ जंग की इब्तिदा की इजाज़त नहीं देती जिनसे मुसलमानों का सक्रिय अमन का समझौता हो। इस्लाम अहद तोड़ने से सख़्त मना करता है। जंग सिर्फ़ उन्हीं के ख़िलाफ़ जायज़ है जिन्होंने साफ़ तौर पर अहद तोड़ा या जारियत की इब्तिदा की।
इसलिए इस आयत का ग़लत इस्तेमाल नहीं हो सकता — जैसा कि क़ादियानियों ने करने की कोशिश की — कि बिना शर्त किसी भी काफ़िर के ख़िलाफ़ जंग जायज़ हो। इस्लामी जंग हमेशा जायज़, जवाबी और नापी-तुली होती है।
मोमिन को याद दिलाया गया कि असल ख़ौफ़ सिर्फ़ अल्लाह का है।
मोमिन दुनियावी चीज़ों से फ़ितरी तौर पर डर सकता है — जैसे हज़रत मूसा (अलै.) साँप से डरे, लेकिन इससे उनके ईमान में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा।
इसलिए दुश्मनों या ख़तरों का कोई डर मोमिन को अल्लाह के हुक्म से पीछे नहीं हटा सकता।
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