Transliteration: (Wa yuzhib ghaiza quloobihim; wa yatoobullaahu 'alaa mai yashaaa'; wallaahu 'Aleemun Hakeem)
यह आयत पिछली आयत का सिलसिला जारी रखती है: फतह और अल्लाही इंसाफ़ के ज़रिए न सिर्फ़ काफ़िरों से पहुँचा बाहरी नुक़सान दूर होगा, बल्कि मोमिनों को लगा अंदरूनी दर्द और ग़ुस्सा भी ठंडा और ख़त्म हो जाएगा।
आयत यह भी बताती है कि इस्लाम के कुछ सख़्त दुश्मन भी आख़िरकार तौबा करके ईमान लाएँगे। यह पेशीनगोई मौजिज़ाना तौर पर पूरी हुई, क्योंकि इन नामचीन हस्तियों ने बाद में इस्लाम क़बूल किया:
ये सब पूरी वफ़ादारी से मुसलमान बन गए और नबी ﷺ के मददगार हुए।
यह अल्लाह की उस सिफ़त की याद दिलाता है कि वह जिससे चाहता है तौबा क़बूल करता है, और उसकी क़ुदरत है कि सबसे सख़्त दुश्मनों के दिलों को भी बदल दे। वह लोगों की सच्ची नियतों को जानने वाला है और हिदायत व बख़्शिश में हिकमत वाला है।
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