Transliteration: (Am hasibtum an tutrakoo wa lammaa ya'lamil laahul lazeena jaahadoo minkum wa lam yattakhizoo min doonil laahi wa laa Rasoolihee wa lalmu'mineena waleejah; wallaahu khabeerum bimaa ta'maloon)
यह आयत बताती है कि अपने दीन के लिए जद्दोजहद और आज़माइशों के ज़रिए अल्लाह सच्चे मोमिनों को मुनाफ़िक़ों से जुदा करके ज़ाहिर करेगा।
इस आज़माइश के बग़ैर यह फ़र्क़ पोशीदा रहता। आयत याद दिलाती है कि मोमिन को सिर्फ़ अल्लाह, उसके रसूल ﷺ और हम-ईमान मोमिनों पर भरोसा करना चाहिए, ख़ास तौर पर मुश्किलात और जंग के वक़्त।
अल्लाह हर चीज़ का जानने वाला है, और उसकी राह में की गई हर कोशिश ठीक-ठीक दर्ज़ की जाती है।
आयत का यह हिस्सा उन लोगों के लिए है जो जिहाद जैसे फ़र्ज़ से बचना चाहते हैं। वह फ़रमाता है: "क्या तुम यह चाहते हो कि जंगे-मुक़द्दस तुम पर फ़र्ज़ ही न हो?" ऐसी ख्वाहिश अल्लाह के उस मंसूबे के ख़िलाफ़ है जो क़ुर्बानी और वफ़ादारी से ईमान को आज़माता है।
जिहाद एक कसौटी बन जाता है:
इस तरह आयत जिहाद को सिर्फ़ जिस्मानी जद्दोजहद नहीं, बल्कि एक रूहानी कसौटी क़रार देती है जो सच्ची वफ़ादारी को छिपी बेवफ़ाई से जुदा करती है।
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