Transliteration: (Kaifa wa iny-yazharoo 'alaikum laa yarquboo feekum illanw wa laa zimmah; yurdoo nakum biafwaahihim wa ta'baa quloobuhum wa aksaruhum faasiqoon)
यह आयत अहद तोड़ने वाले काफ़िरों के मुनाफ़िक़ाना रवैये और बेवफ़ाई को उजागर करती है। अगर वे कभी मुसलमानों पर ग़ालिब आ जाएँ तो वे न किसी रिश्ते की परवाह करेंगे, न समझौतों का लिहाज़ करेंगे, और मोमिनों पर ज़ुल्म करने से नहीं हिचकेंगे। उनका इतिहास लगातार बेवफ़ाई का है, इसलिए उन पर आँख बंद करके भरोसा करना अक़्लमंदी नहीं।
यह आयत सिखाती है कि मुसलमान को समझदारी के साथ काम करना चाहिए। जहाँ धोखेबाज़ी साबित हो वहाँ भरोसा नहीं किया जाता। और किसी की इताअत — चाहे माँ-बाप, उस्ताद या रहनुमा ही क्यों न हों — कभी अल्लाह की नाफ़रमानी का ज़रिया नहीं बननी चाहिए। उसूल साफ़ है: "ख़ालिक़ की नाफ़रमानी करके मख़लूक़ की इताअत नहीं की जाती।" यानी कोई दुनियावी रिश्ता दीनी फ़र्ज़ों के आड़े नहीं आना चाहिए।
कुरआन ने "उनमें ज़्यादातर" का जुमला इस्तेमाल किया है, जिससे पता चलता है कि सभी काफ़िर धोखेबाज़ नहीं हैं। कुछ अपने अहदों पर क़ायम रहते हैं, लेकिन अक्सरियत नाफ़रमान है — ख़ास तौर पर वादे पूरे न करने में। इससे यह भी साफ़ होता है कि इस्लाम का रवैया नापा-तुला और इंसाफ़ पर होता है — वह धोखेबाज़ और वफ़ादार में फ़र्क़ करता है।
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