Transliteration: (Kaifa yakoonu lilmush rikeena 'ahdun 'indallaahi wa 'inda Rasoolihee illal lazeena 'aahattum 'indal Masjidil Haraami famas taqaamoo lakum fastaqeemoo lahum; innallaaha yuhibbul muttaqeen)
यह आयत एक अलंकारिक प्रश्न से शुरू होती है, जो उन मुशरिकों से समझौता क़ायम रखने के ख़याल को रद्द करती है जिन्होंने बार-बार अपने अहद तोड़े। इससे साफ़ होता है कि मुसलमान उनके साथ समझौते पर क़ायम रहने के पाबंद नहीं, जो लगातार बेवफ़ाई दिखाएँ। फ़िक़्ही उसूल यह निकलता है: अगर कोई फ़रीक़ (पक्ष) अहद तोड़े, तो मुसलमान उस अहद को पूरा करने के पाबंद नहीं रहते।
इसका अपवाद उन मुशरिकों के लिए है जो अपने अहदों पर क़ायम रहे, जैसे बनी हमज़ा, जिनसे मुसलमानों ने मस्जिद-ए-हराम के पास अमन का समझौता किया था — मुराद हुदैबिया की सुलह है। इन क़बीलों को नुक़सान नहीं पहुँचाया जाएगा और उनका अहद उसकी अवधि तक पूरा किया जाएगा — जब तक वे ख़ुद उस पर क़ायम रहें।
आयत साफ़ हुक्म देती है: अगर दूसरा फ़रीक़ वफ़ादार रहे, तो मुसलमान पूरी दियानतदारी से अपनी तरफ़ का अहद पूरा करें। लेकिन अगर अहद तोड़ा जाए, तो मुसलमानों को उचित जवाब देने की इजाज़त है, ज़रूरत पड़ने पर अपनी हिफ़ाज़त के लिए जंग भी कर सकते हैं।
इस आख़िरी हिस्से में एक अहम अख़्लाक़ी सबक़ है: परहेज़गारी में अल्लाह की इबादत और इंसानी वादों की वफ़ा दोनों शामिल हैं। जो मुसलमान — चाहे ग़ैर-मुस्लिम से ही — अहद तोड़ता है, वह नेक लोगों में से नहीं। जैसे परिंदे को उड़ने के लिए दो पर चाहिए, उसी तरह सच्ची नेकी के लिए रूहानी इबादत और अख़्लाक़ी अमल दोनों ज़रूरी हैं।
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