कुरान - 9:7 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

7
كَيۡفَ يَكُونُ لِلۡمُشۡرِكِينَ عَهۡدٌ عِندَ ٱللَّهِ وَعِندَ رَسُولِهِۦٓ إِلَّا ٱلَّذِينَ عَٰهَدتُّمۡ عِندَ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِۖ فَمَا ٱسۡتَقَٰمُواْ لَكُمۡ فَٱسۡتَقِيمُواْ لَهُمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلۡمُتَّقِينَ,

Transliteration: (Kaifa yakoonu lilmush rikeena 'ahdun 'indallaahi wa 'inda Rasoolihee illal lazeena 'aahattum 'indal Masjidil Haraami famas taqaamoo lakum fastaqeemoo lahum; innallaaha yuhibbul muttaqeen)

मुशरिकों का अल्लाह और उसके रसूल के पास कोई अहद कैसे हो सकता है [15]? हाँ, उनके सिवा जिनसे तुमने मस्जिद-ए-हराम के पास अहद [16] किया है। तो जब तक वे तुम्हारे लिए (अहद पर) क़ायम रहें, तुम भी उनके लिए क़ायम रहो [17]। बेशक अल्लाह मुत्तक़ियों से मोहब्बत करता है [18]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 7 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 7 की तफ़्सीर

✅ [15] बार-बार अहद तोड़ने वालों से कोई अहद नहीं

यह आयत एक अलंकारिक प्रश्न से शुरू होती है, जो उन मुशरिकों से समझौता क़ायम रखने के ख़याल को रद्द करती है जिन्होंने बार-बार अपने अहद तोड़े। इससे साफ़ होता है कि मुसलमान उनके साथ समझौते पर क़ायम रहने के पाबंद नहीं, जो लगातार बेवफ़ाई दिखाएँ। फ़िक़्ही उसूल यह निकलता है: अगर कोई फ़रीक़ (पक्ष) अहद तोड़े, तो मुसलमान उस अहद को पूरा करने के पाबंद नहीं रहते।

✅ [16] छूट: बनी हमज़ा जैसे वफ़ादार क़बीले

इसका अपवाद उन मुशरिकों के लिए है जो अपने अहदों पर क़ायम रहे, जैसे बनी हमज़ा, जिनसे मुसलमानों ने मस्जिद-ए-हराम के पास अमन का समझौता किया था — मुराद हुदैबिया की सुलह है। इन क़बीलों को नुक़सान नहीं पहुँचाया जाएगा और उनका अहद उसकी अवधि तक पूरा किया जाएगा — जब तक वे ख़ुद उस पर क़ायम रहें।

✅ [17] अहद के हुकूक़ आपसी होते हैं

आयत साफ़ हुक्म देती है: अगर दूसरा फ़रीक़ वफ़ादार रहे, तो मुसलमान पूरी दियानतदारी से अपनी तरफ़ का अहद पूरा करें। लेकिन अगर अहद तोड़ा जाए, तो मुसलमानों को उचित जवाब देने की इजाज़त है, ज़रूरत पड़ने पर अपनी हिफ़ाज़त के लिए जंग भी कर सकते हैं।

✅ [18] बेवफ़ाई बदकारों की निशानी

इस आख़िरी हिस्से में एक अहम अख़्लाक़ी सबक़ है: परहेज़गारी में अल्लाह की इबादत और इंसानी वादों की वफ़ा दोनों शामिल हैं। जो मुसलमान — चाहे ग़ैर-मुस्लिम से ही — अहद तोड़ता है, वह नेक लोगों में से नहीं। जैसे परिंदे को उड़ने के लिए दो पर चाहिए, उसी तरह सच्ची नेकी के लिए रूहानी इबादत और अख़्लाक़ी अमल दोनों ज़रूरी हैं।

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