कुरान - 9:5 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

5
فَإِذَا ٱنسَلَخَ ٱلۡأَشۡهُرُ ٱلۡحُرُمُ فَٱقۡتُلُواْ ٱلۡمُشۡرِكِينَ حَيۡثُ وَجَدتُّمُوهُمۡ وَخُذُوهُمۡ وَٱحۡصُرُوهُمۡ وَٱقۡعُدُواْ لَهُمۡ كُلَّ مَرۡصَدٖۚ فَإِن تَابُواْ وَأَقَامُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَوُاْ ٱلزَّكَوٰةَ فَخَلُّواْ سَبِيلَهُمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ رَّحِيمٞ,

Transliteration: (Fa izansalakhal Ashhurul Hurumu faqtulul mushrikeena haisu wajattumoohum wa khuzoohum wahsuroohum waq'udoo lahum kulla marsad; fa-in taaboo wa aqaamus Salaata wa aatawuz Zakaata fakhalloo sabeelahum; innal laaha Ghafoorur Raheem)

फिर जब हराम (मुक़द्दस) महीने [8] गुज़र जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ [10] पाओ क़त्ल [9] करो, उन्हें पकड़ो, उन्हें घेरो और हर घात की जगह [11] उनकी ताक में बैठो। फिर अगर वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका रास्ता [12] छोड़ दो। बेशक अल्लाह बख़्शने वाला और रहम करने वाला है [13]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 5 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 5 की तफ़्सीर

✅ [8] हराम महीनों का मतलब

तफ़्सीर रूहुल बयान के अनुसार इस आयत में "हराम महीने" से मुराद वे पारंपरिक महीने (रजब, ज़ुल-क़ादा, ज़ुल-हिज्जा, मुहर्रम) नहीं, बल्कि समझौता तोड़ने वाले मुशरिकों को दी गई चार महीने की पनाह की अवधि है। ये महीने स्थायी हुरमत वाले नहीं थे, बल्कि अमन के थे। यह आयत मंसूख़ नहीं है। अवधि ख़त्म होने के बाद जंग के सामान्य क़वायद लागू हो गए, चाहे वे कभी जंग से मना किए हुए महीने ही क्यों न रहे हों।

✅ [9-10] अवधि के बाद पनाह का पूरी तरह ख़त्म होना

चार महीने की मोहलत ख़त्म होने के बाद, बनी हमज़ा जैसे क़बीले भी — जिनके समझौते में अभी नौ महीने बाक़ी थे — अपनी अवधि पूरी कर सकते थे, लेकिन कोई नया समझौता क़बूल नहीं किया जाएगा। आयत मुसलमानों को हुक्म देती है कि कुफ़्र पर अड़े रहने वालों के साथ नरमी न करें:

  • उन्हें जहाँ पाओ क़त्ल करो।
  • उन्हें पकड़ो और क़ैद करो।
  • ज़रूरत पड़े तो घात में बैठो।
  • यहाँ तक कि मस्जिद-ए-हराम जैसी पनाहगाहें भी हक़ से बचने का ज़रिया नहीं बन सकतीं।

✅ [11] जंग में खुली इजाज़त

हर जगह घात में बैठने के हुक्म का मतलब है कि जंग में वह सब जायज़ है जिसे इस्लाम ने साफ़ तौर पर मना नहीं किया। यह मुसलमानों की पूरी सैन्य तैयारी को दर्शाता है जब अमन के सारे रास्ते ख़त्म हो जाएँ और दुश्मन की धोखेबाज़ी सामने आ जाए।

✅ [12] तौबा सज़ा को मिटा देती है

आयत तुरंत रहमत का रास्ता खोलती है। अगर मुशरिक:

  • तौबा कर लें (इस्लाम क़बूल कर लें)
  • नमाज़ क़ायम करें
  • ज़कात दें

तो उनके लिए आज़ादी और अमन का रास्ता खुल जाता है। इससे यह सीख मिलती है:

  • ईमान के अमल के साथ मजबूरी या हालात की वजह से किया गया ईमान भी दुरुस्त है।
  • नमाज़ और ज़कात सच्चे इस्लाम क़बूल करने की पहचान हैं।
  • जो क़ैदी ईमान का दावा करे लेकिन नमाज़ न पढ़े, उसे रिहा नहीं किया जा सकता, क्योंकि नमाज़ तौबा की सच्चाई की कसौटी है।

✅ [13] ईमान और अमल से बख़्शिश

अगर तौबा सच्ची हो और नमाज़-ज़कात से साबित हो, तो अल्लाह की रहमत से पिछले सारे कुफ़्र और गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं। तफ़्सीर रूहुल बयान का फ़िक़्ही उसूल: मजबूर किया गया मुर्तद क़त्ल नहीं किया जाएगा, बल्कि उसे दोबारा इस्लाम की राह दिखाने की कोशिश की जाएगी; ख़ास तौर पर औरत मुर्तद को मौत की सज़ा नहीं है, उसे फिर से ईमान क़बूल करने की तरग़ीब दी जाएगी।

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