Transliteration: (Fa izansalakhal Ashhurul Hurumu faqtulul mushrikeena haisu wajattumoohum wa khuzoohum wahsuroohum waq'udoo lahum kulla marsad; fa-in taaboo wa aqaamus Salaata wa aatawuz Zakaata fakhalloo sabeelahum; innal laaha Ghafoorur Raheem)
तफ़्सीर रूहुल बयान के अनुसार इस आयत में "हराम महीने" से मुराद वे पारंपरिक महीने (रजब, ज़ुल-क़ादा, ज़ुल-हिज्जा, मुहर्रम) नहीं, बल्कि समझौता तोड़ने वाले मुशरिकों को दी गई चार महीने की पनाह की अवधि है। ये महीने स्थायी हुरमत वाले नहीं थे, बल्कि अमन के थे। यह आयत मंसूख़ नहीं है। अवधि ख़त्म होने के बाद जंग के सामान्य क़वायद लागू हो गए, चाहे वे कभी जंग से मना किए हुए महीने ही क्यों न रहे हों।
चार महीने की मोहलत ख़त्म होने के बाद, बनी हमज़ा जैसे क़बीले भी — जिनके समझौते में अभी नौ महीने बाक़ी थे — अपनी अवधि पूरी कर सकते थे, लेकिन कोई नया समझौता क़बूल नहीं किया जाएगा। आयत मुसलमानों को हुक्म देती है कि कुफ़्र पर अड़े रहने वालों के साथ नरमी न करें:
हर जगह घात में बैठने के हुक्म का मतलब है कि जंग में वह सब जायज़ है जिसे इस्लाम ने साफ़ तौर पर मना नहीं किया। यह मुसलमानों की पूरी सैन्य तैयारी को दर्शाता है जब अमन के सारे रास्ते ख़त्म हो जाएँ और दुश्मन की धोखेबाज़ी सामने आ जाए।
आयत तुरंत रहमत का रास्ता खोलती है। अगर मुशरिक:
तो उनके लिए आज़ादी और अमन का रास्ता खुल जाता है। इससे यह सीख मिलती है:
अगर तौबा सच्ची हो और नमाज़-ज़कात से साबित हो, तो अल्लाह की रहमत से पिछले सारे कुफ़्र और गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं। तफ़्सीर रूहुल बयान का फ़िक़्ही उसूल: मजबूर किया गया मुर्तद क़त्ल नहीं किया जाएगा, बल्कि उसे दोबारा इस्लाम की राह दिखाने की कोशिश की जाएगी; ख़ास तौर पर औरत मुर्तद को मौत की सज़ा नहीं है, उसे फिर से ईमान क़बूल करने की तरग़ीब दी जाएगी।
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