कुरान - 9:6 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

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وَإِنۡ أَحَدٞ مِّنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ ٱسۡتَجَارَكَ فَأَجِرۡهُ حَتَّىٰ يَسۡمَعَ كَلَٰمَ ٱللَّهِ ثُمَّ أَبۡلِغۡهُ مَأۡمَنَهُۥۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمۡ قَوۡمٞ لَّا يَعۡلَمُونَ,

Transliteration: (Wa in ahadum minal mushrikeenas tajaaraka fa ajirhu hattaa yasma'a Kalaamal laahi summa ablighhu maa manah; zaalika bi annahum qawmul laa ya'lamoon)

और अगर मुशरिकों में से कोई तुमसे पनाह माँगे [14] तो उसे पनाह दो, यहाँ तक कि वह अल्लाह का कलाम सुन ले। फिर उसे उसकी अमन वाली जगह पहुँचा दो। यह इसलिए कि वे ऐसे लोग हैं जो नहीं जानते। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 6 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 6 की तफ़्सीर

✅ [14] सच्चे तलबगार को पनाह और दावत

यह आयत एक रहमत भरी छूट देती है: चार महीने की मोहलत ख़त्म हो जाने के बाद भी अगर वह मुशरिक जो नए हुक्म के तहत सज़ा का मुस्तहिक़ है, पनाह माँगे तो मुसलमानों को उसे पनाह देनी होगी — स्थायी रूप से नहीं, बल्कि इतनी देर कि वह इस्लाम का पैग़ाम सुन सके। यह इस्लाम का इंसाफ़ और दावत का जज़्बा दिखाता है, मुठभेड़ के दौर में भी।

इससे कई फ़िक़्ही और अख़्लाक़ी उसूल निकलते हैं:

  • इस्लामी मुल्क में अस्थायी पनाह माँगने वाला ग़ैर-मुस्लिम महफ़ूज़ हो जाता है — दी गई अवधि में उसकी जान और माल की हिफ़ाज़त की जाती है।
  • यह पनाह उसे स्थायी बसने का हक़ नहीं देती; यह सिर्फ़ अस्थायी अमान है।
  • अगर वह इस्लाम क़बूल न करे और न जज़िया देने पर राज़ी हो, तो उसे सुरक्षित रूप से मुस्लिम इलाक़े से बाहर पहुँचा दिया जाए।
  • इसका असल मक़सद दावत है — उसे अमन के साथ अल्लाह का कलाम सुनने का मौक़ा देना, ताकि वह हिदायत पा सके।

यह आयत इस्लाम के इंसाफ़ और रहमत के तवाज़ुन को दिखाती है — दुश्मन को भी दोबारा सोचने का मौक़ा देती है, ताकि जिहालत हक़ पाने में रुकावट न बने।

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