Transliteration: (Wa in ahadum minal mushrikeenas tajaaraka fa ajirhu hattaa yasma'a Kalaamal laahi summa ablighhu maa manah; zaalika bi annahum qawmul laa ya'lamoon)
यह आयत एक रहमत भरी छूट देती है: चार महीने की मोहलत ख़त्म हो जाने के बाद भी अगर वह मुशरिक जो नए हुक्म के तहत सज़ा का मुस्तहिक़ है, पनाह माँगे तो मुसलमानों को उसे पनाह देनी होगी — स्थायी रूप से नहीं, बल्कि इतनी देर कि वह इस्लाम का पैग़ाम सुन सके। यह इस्लाम का इंसाफ़ और दावत का जज़्बा दिखाता है, मुठभेड़ के दौर में भी।
इससे कई फ़िक़्ही और अख़्लाक़ी उसूल निकलते हैं:
यह आयत इस्लाम के इंसाफ़ और रहमत के तवाज़ुन को दिखाती है — दुश्मन को भी दोबारा सोचने का मौक़ा देती है, ताकि जिहालत हक़ पाने में रुकावट न बने।
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