कुरान - 9:4 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

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إِلَّا ٱلَّذِينَ عَٰهَدتُّم مِّنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ ثُمَّ لَمۡ يَنقُصُوكُمۡ شَيۡـٔٗا وَلَمۡ يُظَٰهِرُواْ عَلَيۡكُمۡ أَحَدٗا فَأَتِمُّوٓاْ إِلَيۡهِمۡ عَهۡدَهُمۡ إِلَىٰ مُدَّتِهِمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلۡمُتَّقِينَ,

Transliteration: (Illal lazeena 'aahattum minal mushrikeena summa lam yanqusookum shai'anw-wa lam yuzaahiroo 'alaikum ahadan fa atimmooo ilaihim 'ahdahum ilaa muddatihim; innal laaha yuhibbul muttaqeen)

परन्तु उन मुशरिकों से जिनसे तुमने समझौता किया था और उन्होंने समझौते में कोई कमी नहीं की और न तुम्हारे ख़िलाफ़ किसी की मदद की [7] — तो उनका समझौता उनकी अवधि तक पूरा करो। बेशक अल्लाह मुत्तक़ियों से मोहब्बत करता है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 4 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 4 की तफ़्सीर

✅ [7] वफ़ादार मुशरिक क़बीलों का हक़ और समझौते की पाबंदी

यह आयत उन मुशरिक क़बीलों को इस हुक्म से अलग रखती है जो मुसलमानों से किए हुए अपने समझौतों पर क़ायम रहे। यह साबित करती है कि इस्लाम इंसाफ़ करता है — ग़ैर-मुस्लिमों के साथ भी, जब तक वे समझौता न तोड़ें और मुसलमानों के ख़िलाफ़ दुश्मनों की मदद न करें।

समझौता तोड़ने की मिसाल बनी बक्र का क़बीला है, जिसने नबी ﷺ के मित्र क़बीले बनी ख़ुज़ाआ पर हमले में मदद की। उनकी बेवफ़ाई की वजह से वे समझौते की पनाह से महरूम हो गए।

लेकिन जिन्होंने अपने समझौते का सम्मान किया, मुसलमानों को हुक्म दिया गया कि वे समझौते को उसकी पूरी अवधि तक पूरा करें। यह इस्लाम के उसूल को दर्शाता है — अहद की पूर्ति और नेकी। अल्लाह नेकी करने वालों से मोहब्बत करता है, यानी उनसे जो मुश्किल हालात में भी इंसाफ़ और वफ़ा करते हैं।

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