Transliteration: (Wa azaanum minal laahi wa Rasooliheee ilan naasi yawmal Hajjil Akbari annal laaha bareee'um minal mushrikeena wa Rasooluh; fa-in tubtum fahuwa khairullakum wa in tawallaitum fa'lamooo annakum ghairu mu'jizil laah; wa bashiril lazeena kafaroo biazaabin aleem)
इस आयत में उस खुले एलान का ज़िक्र है जो हज़रत अली (रज़ि.) ने हज-ए-अकबर के मौके पर रसूलुल्लाह ﷺ की तरफ़ से किया। इसमें साफ़ कर दिया गया कि अल्लाह और उसका रसूल ﷺ उन तमाम मुशरिकों से बरी हैं जिन्होंने अपने अहद तोड़े।
आयत में मुशरिकों से कहा गया कि अगर तुम तौबा कर लो तो तुम्हारे लिए बेहतर है। यानी इस्लाम क़बूल करने से फ़ायदा सिर्फ़ तुम्हें ही होगा, नबी ﷺ या अल्लाह की शान में कोई कमी नहीं आएगी।
यह एलान ख़ास तौर पर अरब के मुशरिकों के लिए था जिन्होंने अहद तोड़े।
इस आयत में मुशरिकों को दोहरी चेतावनी दी गई:
मुमिनों के लिए यह आयत सुकून और तसल्ली है कि अल्लाह उनकी हिफ़ाज़त करता है और जो मुश्किलें उन पर आती हैं वह इम्तेहान हैं, अज़ाब नहीं।
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