क्या तुमने हाजियों को पानी पिलाने और मस्जिद-ए-हराम की ख़िदमत को उस (मोमिन) के बराबर [41] कर दिया जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान [42] रखता है और अल्लाह की राह में जंग करता है? अल्लाह के नज़दीक ये बराबर नहीं। और अल्लाह ज़ालिम लोगों को हिदायत नहीं देता [43]।
मक्का के मुशरिक मुहाजिर मुसलमानों को ताना मारते थे कि तुमने काबा छोड़ दिया, फिर भी उसकी ख़िदमत का दावा करते हो। इसके जवाब में अल्लाह ने यह आयत नाज़िल की, जिससे साफ़ हो गया कि असल इबादत बग़ैर ईमान की रस्में नहीं, बल्कि अल्लाह के लिए क़ुर्बानी और सच्चाई है।
इससे हम सीखते हैं कि अल्लाह ख़ुद अपने सच्चे बंदों की हिमायत करता है और उनके नुक़्ताचीनों का सीधा जवाब देता है। सुब्हानल्लाह! यह अल्लाह की क़ुर्बत और इज़्ज़त का बुलंद तरीन मरतबा है।
यह आयत सिखाती है कि नबी करीम ﷺ की इताअत इबादत की सबसे बुलंद सूरत है। मुहाजिर मुसलमानों को उन लोगों पर फ़ज़ीलत दी गई जो सिर्फ़ काबा की ख़िदमत के लिए मक्का में रुके रहे।
यहाँ एक गहरा फ़र्क़ बताया गया है:
जो काबा को देखता है वह हाजी बनता है, लेकिन जो काबा की शान ﷺ को देखता है वह सहाबी बनता है।
इसलिए लाखों हाजी एक सहाबी के क़दमों की गर्द के बराबर भी नहीं।
यह हिस्सा इस बात पर ज़ोर देता है कि कोई भी इबादत या ख़िदमत — चाहे हाजियों को पानी पिलाना हो या काबा की देखभाल — बग़ैर ईमान के क़ुबूल नहीं होती।
इसलिए बग़ैर ईमान वाले — चाहे वे कितनी ही बाहरी ख़िदमत करें — अल्लाह की तरफ़ से हिदायत नहीं पाते, क्योंकि ईमान अल्लाही क़ुबूलियत की बुनियादी शर्त है।
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सूरह अत-तौबा आयत 19 तफ़सीर