कुरान - 9:19 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

19
۞أَجَعَلۡتُمۡ سِقَايَةَ ٱلۡحَآجِّ وَعِمَارَةَ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِ كَمَنۡ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَجَٰهَدَ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِۚ لَا يَسۡتَوُۥنَ عِندَ ٱللَّهِۗ وَٱللَّهُ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلظَّـٰلِمِينَ,

Transliteration: (Aja'altum siqaayatal haaajji wa 'imaaratal masjidil haraami kamman aamana billaahi wal Yawmil Aakhiri wa jaahada fee sabeelil laah; laa yastawoona 'indal laah; wallaahu laa yahdil qawmaz zaalimeen)

क्या तुमने हाजियों को पानी पिलाने और मस्जिद-ए-हराम की ख़िदमत को उस (मोमिन) के बराबर [41] कर दिया जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान [42] रखता है और अल्लाह की राह में जंग करता है? अल्लाह के नज़दीक ये बराबर नहीं। और अल्लाह ज़ालिम लोगों को हिदायत नहीं देता [43]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 19 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 19 की तफ़्सीर

✅ [41] शान-ए-नुज़ूल: मुहाजिर मोमिनों की हिमायत

मक्का के मुशरिक मुहाजिर मुसलमानों को ताना मारते थे कि तुमने काबा छोड़ दिया, फिर भी उसकी ख़िदमत का दावा करते हो। इसके जवाब में अल्लाह ने यह आयत नाज़िल की, जिससे साफ़ हो गया कि असल इबादत बग़ैर ईमान की रस्में नहीं, बल्कि अल्लाह के लिए क़ुर्बानी और सच्चाई है।

इससे हम सीखते हैं कि अल्लाह ख़ुद अपने सच्चे बंदों की हिमायत करता है और उनके नुक़्ताचीनों का सीधा जवाब देता है। सुब्हानल्लाह! यह अल्लाह की क़ुर्बत और इज़्ज़त का बुलंद तरीन मरतबा है।

✅ [42] रस्मी ख़िदमत से बाला तर ईमान और नबवी इताअत

यह आयत सिखाती है कि नबी करीम ﷺ की इताअत इबादत की सबसे बुलंद सूरत है। मुहाजिर मुसलमानों को उन लोगों पर फ़ज़ीलत दी गई जो सिर्फ़ काबा की ख़िदमत के लिए मक्का में रुके रहे।

  • मक्का वाले अल्लाह के घर की ख़िदमत करते थे,
  • और मुहाजिर अल्लाह के महबूब ﷺ की ख़िदमत करते थे — जो काबा की इज़्ज़त और शान हैं।

यहाँ एक गहरा फ़र्क़ बताया गया है:

जो काबा को देखता है वह हाजी बनता है, लेकिन जो काबा की शान ﷺ को देखता है वह सहाबी बनता है।

इसलिए लाखों हाजी एक सहाबी के क़दमों की गर्द के बराबर भी नहीं।

✅ [43] ईमान के बग़ैर इबादत क़ुबूल नहीं

यह हिस्सा इस बात पर ज़ोर देता है कि कोई भी इबादत या ख़िदमत — चाहे हाजियों को पानी पिलाना हो या काबा की देखभाल — बग़ैर ईमान के क़ुबूल नहीं होती।

  • ईमान सभी आमाल की क़ुबूलियत की बुनियादी शर्त है।
  • जैसे वुज़ू के बग़ैर नमाज़ नहीं, उसी तरह ईमान के बग़ैर इबादत नहीं।

इसलिए बग़ैर ईमान वाले — चाहे वे कितनी ही बाहरी ख़िदमत करें — अल्लाह की तरफ़ से हिदायत नहीं पाते, क्योंकि ईमान अल्लाही क़ुबूलियत की बुनियादी शर्त है।

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