कुरान - 9:20 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

20
ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَهَاجَرُواْ وَجَٰهَدُواْ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ بِأَمۡوَٰلِهِمۡ وَأَنفُسِهِمۡ أَعۡظَمُ دَرَجَةً عِندَ ٱللَّهِۚ وَأُوْلَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡفَآئِزُونَ,

Transliteration: (Allazeena aamanoo wa haajaroo wa jaahadoo fee sabeelil laahi bi amwaalihim wa anfusihim a'zamu darajatan 'indal laah; wa ulaaa'ika humul faaa'izoon)

जो लोग ईमान लाए, हिजरत की और अल्लाह की राह में अपने माल और जान से जंग [44] की [45] — वे अल्लाह के नज़दीक बड़े दर्जे वाले हैं, और वही लोग कामयाब हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 20 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 20 की तफ़्सीर

✅ [44] जिहाद की तीन क़िस्में: माल, जान, और दोनों

यह आयत जिहाद की तीन मानी-पहचानी क़िस्में बताती है:

  • सिर्फ़ जान से जिहाद — उन ग़रीब मुसलमानों ने यह किया जो माली मदद नहीं कर सकते थे, लेकिन ख़ुद लड़े।
  • सिर्फ़ माल से जिहाद — अमीर लेकिन जिस्मानी तौर पर नाक़ाबिल मोमिनों ने घोड़े, हथियार और साज़ो-सामान मुहैया किए।
  • जान और माल दोनों से जिहाद — जिन्होंने ख़ुद जंग की और दूसरे सैनिकों की माली मदद भी की।

ये तीनों गुट इस आयत में शामिल हैं, लेकिन इसमें आहिस्ता-आहिस्ता यह बताया गया कि मुहाजिरों को अन्सार पर फ़ज़ीलत है, हालाँकि दोनों अल्लाह के प्यारे हैं।

✅ [45] ईमानदार जंग करने वालों की फ़ज़ीलत

उनकी फ़ज़ीलत सिर्फ़ काफ़िरों पर ही नहीं, बल्कि मोमिनों में भी उन्हें अपनी क़ुर्बानी और वफ़ादारी की वजह से ख़ास बुलंद दर्जा हासिल है।

  • अल्लाह के नज़दीक काफ़िरों की कोई हैसियत नहीं।
  • उनकी मुसलमान जंग करने वालों से तुलना बेकार है।

हज़रत नूह (अलै.) के ज़माने की मिसाल: कश्ती में जानवरों को दाख़िले की इजाज़त मिली, लेकिन काफ़िर को नहीं।

अल्लाह सूरा अल-बय्यिना (98:6) में फ़रमाता है: "बेशक वे (काफ़िर) सारी मख़लूक़ात में सबसे बदतर हैं।"

इसलिए जो ईमान लाए, हिजरत की और सच्चाई से जद्दोजहद की, उन्होंने सबसे बुलंद रूहानी दर्जे हासिल किए और वही सच्चे कामयाब हैं।

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