Transliteration: (Laqad nasarakumul laahu fee mawaatina kaseeratinw wa yawma Hunainin iz a'jabatkum kasratukum falam tughni 'ankum shai'anw wa daaqat 'alaikumul ardu bimaa rahubat summa wallaitum mudbireen)
अल्लाह की मदद कई अहम जंगों में ज़ाहिर हुई, जिनमें बद्र, ख़ैबर, हुदैबिया की सुलह, मक्का की फतह और बनी क़ुरैज़ा व बनी नज़ीर से मुक़ाबले शामिल हैं। इन नाज़ुक लम्हों में मुसलमानों की कामयाबी का बुनियादी सबब यही अल्लाही मदद थी।
ग़ज़वा-ए-हुनैन मक्का की फतह के बाद हुनैन, ताइफ़ और मक्का मुअज़्ज़मा के बीच के जंगल में हुआ।
मुस्लिम फ़ौज तक़रीबन बारह हज़ार सैनिकों पर मुश्तमिल थी, जबकि मुख़ालिफ़ क़बीले हवाज़िन और सक़ीफ़ तक़रीबन चार हज़ार थे।
अपनी तादादी बरतरी पर भरोसा करके मुसलमानों ने पहले बढ़त हासिल की और ग़नीमत इकट्ठा करने लगे।
लेकिन अल्लाह ने उनके इस ग़रूर भरे रवैये को पसंद नहीं फ़रमाया। दुश्मन ने दोबारा सँभलकर तीरों से सख़्त हमला किया, जिससे मुसलमानों में भगदड़ और ख़ौफ़ फैल गया।
नतीजा यह हुआ कि बहुत से मुसलमान मैदान से भाग गए — पहले के भरोसे के बावजूद इंसानी कमज़ोरी सामने आई। सिर्फ़ हज़रत अब्बास और हज़रत अबू सुफ़ियान (रज़ि.) नबी ﷺ के साथ डटे रहे।
"ज़मीन तंग हो गई" का मतलब है कि मैदाने-जंग जिस्मानी तौर पर वसीअ होने के बावजूद, ख़ौफ़ और अफ़रातफ़री की वजह से मुसलमानों को तंग और मुंक़बिज़ लगा, यहाँ तक कि उनके लिए डटे रहना नामुमकिन हो गया।
यह तस्वीर मुसलमानों की शुरुआती पस्ती और उनके लम्हाती इनहिसार की शिद्दत को उजागर करती है।
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