Transliteration: (Qul in kaana aabaaa'ukum wa abnaaa'ukum wa ikhwaanukum wa azwaajukum wa 'asheeratukum wa amwaaluniq taraftumoohaa wa tijaaratun takhshawna kasaadahaa wa masaakinu tardawnahaaa ahabba ilaikum minal laahi wa Rasoolihee wa Jihaadin fee Sabeelihee fatarabbasoo hattaa ya'tiyallahu bi amrih; wallaahu laa yahdil qawmal faasiqeen)
शरीअत के मुक़र्रर किए हुए ख़ानदानी हुक़ूक़ अदा करना जायज़ है, चाहे वे ग़ैर-मुस्लिम ही हों। लेकिन उनके साथ ऐसी दिली मोहब्बत और लगाव जो अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की मोहब्बत से बढ़ जाए, नाजायज़ है।
दिल की गहरी तरफ़दारी कभी अल्लाह और उसके नबी ﷺ के दुश्मनों की तरफ़ नहीं झुकनी चाहिए।
इसके अलावा, किसी काफ़िर से दिली मोहब्बत ख़ुद कुफ़्र की एक क़िस्म मानी गई है।
जब ख़ालिक़ के हुक़ूक़ और मख़लूक़ के हुक़ूक़ आपस में टकराएँ, तो हमेशा ख़ालिक़ के हुक़ूक़ को तरजीह दी जाएगी।
"तुम्हारा क़बीला" के लफ़्ज़ में ससुराल वाले, ख़ून के रिश्तेदार और दूर के ख़ानदानी रिश्ते सब शामिल हैं।
"अपनी कमाई का माल" का ज़िक्र विरासती माल के साथ करके यह बताया गया कि मेहनत से कमाया हुआ माल विरासती माल से ज़्यादा अहमियत और ज़िम्मेदारी रखता है, और यह सच्ची क़ुर्बानी को दर्शाता है।
दुनियावी चीज़ों और माल की मोहब्बत मना नहीं है, बशर्ते वह अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की मोहब्बत पर तरजीह न पाए।
नाजायज़ मोहब्बत, जैसे हराम ताल्लुक़ात, सख़्त मना है।
इस आयत की तफ़्सीर हदीस से जुड़ती है कि जब तक नबी ﷺ इंसान को उसके बाप, बेटे और तमाम लोगों से ज़्यादा प्यारे न हों, वह पक्का मोमिन नहीं।
यह मोहब्बत महज़ अक़्ली या आम लगाव नहीं, बल्कि गहरी, फ़ितरी, इताअत वाली मोहब्बत है — अल्लाह से मोहब्बत जैसी — जो अदब और इताअत पर क़ायम हो।
नबी ﷺ से सच्ची मोहब्बत ईमान का लाज़िमी हिस्सा है, और इस मोहब्बत से महरूम होना कुफ़्र के बराबर और सख़्त अंजाम का मुस्तहिक़ है।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat