कुरान - 9:23 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

23
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تَتَّخِذُوٓاْ ءَابَآءَكُمۡ وَإِخۡوَٰنَكُمۡ أَوۡلِيَآءَ إِنِ ٱسۡتَحَبُّواْ ٱلۡكُفۡرَ عَلَى ٱلۡإِيمَٰنِۚ وَمَن يَتَوَلَّهُم مِّنكُمۡ فَأُوْلَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ,

Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo laa tattakhizooo aabaaa 'akum wa ikhwaanakum awliyaaa'a inis tahabbul kufra 'alal eemaan; wa mai yatawal lahum minkum fa ulaaa'ika humuz zaalimoon)

ऐ ईमान वालो! अपने बाप और भाइयों को दोस्त न बनाओ [48], अगर वे ईमान के मुक़ाबले कुफ़्र को पसंद करें। और तुममें से जो उनसे दोस्ती करेगा, तो वही ज़ालिम हैं [49]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 23 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 23 की तफ़्सीर

✅ [48] ख़ून के रिश्तों पर ईमान की तरजीह

यह आयत सिखाती है कि सबसे बड़ा हक़ अल्लाह और उसके नबी का है।

अगर बाप या भाई ईमान के ख़िलाफ़ खड़े हों, तो दीनी वफ़ादारी में वे क़रीबी रिश्ते की हैसियत खो देते हैं।

✅ [49] अड़े रहने वाले काफ़िरों से नेकी और अलगाव

अगर कोई काफ़िर नादान (बे-ख़बर) हो, तो उसे इस्लाम की राह दिखाने के लिए नेकी और नरमी से पेश आना चाहिए।

लेकिन अगर वह जानबूझकर कुफ़्र पर अड़ा रहे, तो मोमिनों को उससे अलग होना चाहिए, क्योंकि ऐसे लोगों से दोस्ती एक तरह का ज़ुल्म है।

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