कुरान - 9:26 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

26
ثُمَّ أَنزَلَ ٱللَّهُ سَكِينَتَهُۥ عَلَىٰ رَسُولِهِۦ وَعَلَى ٱلۡمُؤۡمِنِينَ وَأَنزَلَ جُنُودٗا لَّمۡ تَرَوۡهَا وَعَذَّبَ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْۚ وَذَٰلِكَ جَزَآءُ ٱلۡكَٰفِرِينَ,

Transliteration: (Summa anzalal laahu sakeenatahoo 'alaa Rasoolihee wa'alal mu'mineena wa anzala junoodal lam tarawhaa wa azzabal lazeena kafaroo; wa zaalika jazaaa'ul kaafireen)

फिर अल्लाह ने अपनी तरफ़ से सकीना (इत्मिनान) नाज़िल किया अपने रसूल पर और मोमिनों पर [58]। और उसने ऐसे लश्कर उतारे जिन्हें तुमने देखा नहीं [59], और काफ़िरों को सज़ा दी। और यही काफ़िरों की सज़ा है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 26 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 26 की तफ़्सीर

✅ [58] भागने वाले मुसलमानों के लिए अल्लाह की बख़्शिश और सकीना

इससे हम सीखते हैं कि ग़ज़वा-ए-हुनैन से भागने वाले मुस्लिम सैनिक मोमिन ही रहे, क्योंकि अल्लाह ने उन्हें माफ़ कर दिया। अल्लाह ने अपना सुकून और सकीना अपने रसूल ﷺ और मोमिनों पर नाज़िल किया।

इसलिए जो लोग आज उन शुरुआती भागने वालों पर एतराज़ या नुक़्ताचीनी करते हैं, वह इस आयत की सच्चाई से इनकार करते हैं। वे सैनिक संभले, मैदान में लौटे और दुश्मन को शिकस्त दी। यह फतह उनकी पहले की पस्ती का कफ़्फ़ारा और अल्लाह की रहमत व बख़्शिश का सबूत बनी।

✅ [59] अल्लाह के अनदेखे लश्कर — फ़रिश्ते

इससे मुराद वे फ़रिश्ते हैं जो हुनैन में मुस्लिम फ़ौज का हौसला और जज़्बा बुलंद करने के लिए आए थे।

बद्र के ख़िलाफ़ जहाँ फ़रिश्तों ने जंग में बराह-ए-रास्त हिस्सा लिया, वहीं हुनैन में उन्होंने सीधे जंग में हिस्सा नहीं लिया। उनकी मौजूदगी का मक़सद मोमिनों को रूहानी तौर पर हौसला और हिम्मत देना था, ताकि दुश्मन के मुक़ाबले में उनका एतिमाद और इरादा मज़बूत हो।

फ़रिश्तों के जिस्मानी तौर पर जंग में शामिल न होने के बावजूद, यह रूहानी मदद आख़िरी फतह में बड़ा सबब बनी।

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