Transliteration: (Summa anzalal laahu sakeenatahoo 'alaa Rasoolihee wa'alal mu'mineena wa anzala junoodal lam tarawhaa wa azzabal lazeena kafaroo; wa zaalika jazaaa'ul kaafireen)
इससे हम सीखते हैं कि ग़ज़वा-ए-हुनैन से भागने वाले मुस्लिम सैनिक मोमिन ही रहे, क्योंकि अल्लाह ने उन्हें माफ़ कर दिया। अल्लाह ने अपना सुकून और सकीना अपने रसूल ﷺ और मोमिनों पर नाज़िल किया।
इसलिए जो लोग आज उन शुरुआती भागने वालों पर एतराज़ या नुक़्ताचीनी करते हैं, वह इस आयत की सच्चाई से इनकार करते हैं। वे सैनिक संभले, मैदान में लौटे और दुश्मन को शिकस्त दी। यह फतह उनकी पहले की पस्ती का कफ़्फ़ारा और अल्लाह की रहमत व बख़्शिश का सबूत बनी।
इससे मुराद वे फ़रिश्ते हैं जो हुनैन में मुस्लिम फ़ौज का हौसला और जज़्बा बुलंद करने के लिए आए थे।
बद्र के ख़िलाफ़ जहाँ फ़रिश्तों ने जंग में बराह-ए-रास्त हिस्सा लिया, वहीं हुनैन में उन्होंने सीधे जंग में हिस्सा नहीं लिया। उनकी मौजूदगी का मक़सद मोमिनों को रूहानी तौर पर हौसला और हिम्मत देना था, ताकि दुश्मन के मुक़ाबले में उनका एतिमाद और इरादा मज़बूत हो।
फ़रिश्तों के जिस्मानी तौर पर जंग में शामिल न होने के बावजूद, यह रूहानी मदद आख़िरी फतह में बड़ा सबब बनी।
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