Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanooo innamal mushrikoona najasun falaa yaqrabul Masjidal Haraama ba'da 'aamihim haaza; wa in khiftum 'ailatan fasawfa yughnee kumul laahu min fadliheee in shaaa'; innallaaha 'Aleemun hakeem)
यहाँ "नापाक" (नजस – نجس) शब्द से मुराद केवल जिस्मानी गंदगी नहीं, बल्कि आक़ीदे की रूहानी गंदगी (आध्यात्मिक अशुद्धता) भी है।
बहुदेववादियों (मुशरिकीन) का ईमान और उनके कर्म इस्लामी तौहीद से बिलकुल विपरीत हैं।
कई ऐसे लोग — जैसे कि भारत के कुछ मूर्तिपूजक — जनाबत (संभोग के बाद की नापाकी) की हालत में भी स्नान (ग़ुस्ल) नहीं करते,
या फिर गोमूत्र को पाक (पवित्र) मानते हैं — जो इस्लामी तालीम के खिलाफ है।
इसलिए अल्लाह ने यहाँ "नजस" कहकर यह जताया कि ऐसे लोगों का न तो ईमान पाक है, न ही उनका ज़ाहिरी तौर-तरीक़ा,
और मुसलमानों को ईमान, तौहीद और पाकीज़गी में उनसे बिलकुल अलग रहना चाहिए।
इस आयत में यह हुक्म दिया गया कि मुशरिक अब मक्का की मस्जिद-ए-हराम के करीब भी न आएं।
"क़रीब न आना" सिर्फ़ दाख़िल न होने का हुक्म नहीं, बल्कि पूरे इलाक़े में तवाफ़, इबादत और मौजूदगी से भी मना किया गया।
इसमें मस्जिद हराम ही नहीं, बल्कि हर वो मस्जिद शामिल है जो अल्लाह के नाम पर बनाई गई हो।
इस आदेश का मक़सद इस्लामी इबादतगाहों को शिर्क से पाक और महफूज़ रखना है।
चूंकि अरब में हज्ज (तीर्थयात्रा) के ज़रिये बड़ी तिजारत होती थी,
तो सहाबा को यह डर हुआ कि अगर ग़ैर-मुस्लिम हज्ज करने न आएं, तो रोज़ी में कमी न हो जाए।
लेकिन अल्लाह ने फ़रमाया कि:
अगर तुम तंगी का डर रखते हो, तो मैं तुम्हें अपनी रहमत से मालदार बना दूँगा,
क्योंकि रिज़्क़ लोगों से नहीं, बल्कि अल्लाह की मर्जी और फ़ज़ल से आता है।
इतिहास गवाह है कि मुशरिकों के हटने के बाद भी हज्ज और कारोबार में कभी कमी नहीं आई, बल्कि मुसलमानों के लिए बरकत और ज़्यादा हुई।
हो सकता है कि कुछ लोगों को यह फ़ैसला तुरंत समझ न आए,
लेकिन अल्लाह की हर बात में गहरी हिकमत (दानाई) और भलाई होती है।
यह हुक्म सिर्फ़ जज़्बात नहीं, बल्कि इल्म और हिकमत पर आधारित है।
जब अल्लाह कोई हुक्म देता है, तो उसका नतीजा हमेशा इंसाफ और भलाई पर होता है,
चाहे हमें उसकी वजह फ़ौरन समझ न आए।
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