कुरान - 9:29 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

29
قَٰتِلُواْ ٱلَّذِينَ لَا يُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَلَا بِٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَلَا يُحَرِّمُونَ مَا حَرَّمَ ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥ وَلَا يَدِينُونَ دِينَ ٱلۡحَقِّ مِنَ ٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡكِتَٰبَ حَتَّىٰ يُعۡطُواْ ٱلۡجِزۡيَةَ عَن يَدٖ وَهُمۡ صَٰغِرُونَ,

Transliteration: (Qaatilul lazeena laa yu'minoona billaahi wa laa bil yawmil Aakhiri wa laa yuharrimoona maa harramal laahu wa Rasooluhoo wa laa yadeenoona deenal haqqi minal lazeena ootul Kitaaba hattaa yu'tul jizyata ai yadinw wa hum saaghiroon)

उन लोगों से जंग करो जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान नहीं रखते [65], और उसे हराम नहीं करते जिसे अल्लाह और उसके रसूल [66] ने हलाल किया है, और सच्चे दीन पर नहीं चलते [67], उन (अहले-किताब) में से जिन्हें किताब दी गई [68] — यहाँ तक कि वे अपने हाथ से ज़लील होकर जज़िया [69] अदा करें। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 29 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 29 की तफ़्सीर

✅ [65] अल्लाह और आख़िरत पर ईमान न रखने वाले

यह जुमला ख़ास तौर पर उन लोगों के लिए है जो अल्लाह की तौहीद और रोज़े-जज़ा पर ईमान को ठुकराते हैं। यह बताता है कि मुक़ाबला उनसे है जो इस्लाम के बुनियादी उसूलों के ख़िलाफ़ हैं और उसके पैग़ाम की दुश्मनी करते हैं।

✅ [66] अल्लाह और रसूल के हलाल को हराम न करना

यह शर्त उन लोगों की तरफ़ इशारा करती है जो कुफ़्र या दुश्मनी की वजह से दूसरों को उन कामों से रोकते हैं जिन्हें अल्लाह और नबी ﷺ ने हलाल किया है — जैसे हलाल तिजारत, इबादत और इस्लामी रिवायात।

✅ [67] सच्चे दीन पर न चलना

"सच्चे दीन पर न चलने" का मतलब इस्लाम की हिदायत और उसूलों को ठुकराना या उनसे मुँह मोड़ना है। यह दीन की सच्चाई क़बूल करने से इनकार है, ख़ास तौर पर उनके लिए जिनके पास पहले दीनी पैग़ाम आ चुका था।

✅ [68] किताब वाले

इससे मुराद अहले-किताब हैं — यानी यहूद और ईसाई, जिन पर पहले की आसमानी किताबें नाज़िल हुईं। आयत उनके मुस्लिम समाज के साथ ताल्लुक़ और अमन के साथ रहने की शर्तों को बयान करती है।

✅ [69] जज़िया अदा करना और ज़लील होना

आयत हुक्म देती है कि मुस्लिम हुकूमत में रहने वाले ये ग़ैर-मुस्लिम जज़िया अदा करें — यानी वह टैक्स जो इस्लामी हुकूमत के तहत ग़ैर-मुस्लिमों से लिया जाता है, जो इस्लामी निज़ाम के आगे उनकी मातहती की निशानी है।

"अपने हाथ से" का जुमला इस बात पर ज़ोर देता है कि यह अदायगी ख़ुशी के साथ हो, जो मुस्लिम हुकूमत के अख़्तियार और उसकी तरफ़ से दी जाने वाली हिफ़ाज़त की तस्लीम को ज़ाहिर करे।

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