Transliteration: (ittakhazooo ahbaarahum wa ruhbaanahum arbaabammin doonil laahi wal Maseehab na Maryama wa maaa umirooo illaa liya'budooo Ilaahanw Waa hidan laaa ilaaha illaa Hoo; Subhaanahoo 'ammaa yushrikoon)
यह सिखाता है कि जो शख़्स किसी की इताअत उस तरह करे जिस तरह अल्लाह और उसके नबी ﷺ की की जाती है, तो यह उस शख़्स को ख़ुदा का दर्जा देने के बराबर है। नेक उलमा, औलिया और नेक लोगों की सच्ची इताअत हालाँकि दीनी तालीमात और नबी ﷺ की इताअत के मुताबिक़ ही होती है।
अल्लाह फ़रमाता है: "अल्लाह की इताअत करो और रसूल की इताअत करो और उन लोगों की जो तुममें से हुक्म रखते हैं" (सूरा अन-निसा 4:59)।
ईसाई और यहूदी अपने दानिशवरों की अल्लाह के ख़िलाफ़ इताअत करते थे और उन्हीं के ज़रिए माफ़ी माँगते थे। इसलिए "अल्लाह के सिवा" का जुमला इस बात पर ज़ोर देता है कि मुसलमान औलिया या दीनी रहनुमाओं के बारे में ऐसे आक़ीदे नहीं रखते।
उन्होंने हज़रत ईसा (अलै.) को अल्लाह का बेटा क़रार देकर ख़ुदा बना लिया, जिससे यह मतलब निकलता है कि वे बाप के साथ एक ही उलूहियत (दिव्य सिफ़त) में शरीक हैं — यह आक़ीदा इस्लाम में मर्दूद है।
अहले-किताब को तौरात और इंजील में भी यही हुक्म दिया गया था कि वे सिर्फ़ एक सच्चे अल्लाह की इबादत करें।
अहले-किताब के बारे में अलग अहकाम होने के बावजूद, अल्लाह के साथ शिर्क करने की वजह से उन्हें यहाँ मुशरिक क़रार दिया गया है।
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