कुरान - 9:32 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

32
يُرِيدُونَ أَن يُطۡفِـُٔواْ نُورَ ٱللَّهِ بِأَفۡوَٰهِهِمۡ وَيَأۡبَى ٱللَّهُ إِلَّآ أَن يُتِمَّ نُورَهُۥ وَلَوۡ كَرِهَ ٱلۡكَٰفِرُونَ,

Transliteration: (Yureedoona ai yutfi'oo nooral laahi bi'afwaahihim wa ya'ballaahu illaaa ai yutimma noorahoo wa law karihal kaafiroon)

वे चाहते हैं कि अल्लाह के नूर को अपने मुँह से बुझा दें, और अल्लाह इनकार करता है मगर यह कि अपने नूर को मुकम्मल करे, चाहे काफ़िर नापसंद ही करें [79]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 32 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 32 की तफ़्सीर

✅ [79] "नूर" का मतलब

यहाँ "नूर" से मुराद नबी करीम ﷺ ही हैं, क्योंकि आगे की आयतें सीधे उन्हीं के बारे में हैं। हज़रत मुल्ला अली क़ारी (रह.) अपनी किताब मौज़ूआत-ए-कबीर में बताते हैं कि कुरआन में जहाँ कहीं "नूर" का ज़िक्र है, वहाँ उससे नबी ﷺ की मुराद ली जाती है।

इस नूर को बुझाने का मतलब नबी करीम ﷺ के लाए हुए दीन को तबाह करने की कोशिश, कुरआन के फैलाव को रोकना, या नबी ﷺ की याद और तारीफ़ को बंद करना है। काफ़िरों की यह कोशिशें और नाराज़गी उनकी इज़्ज़त, शान और आख़िरी कामयाबी पर कोई असर नहीं डालतीं।

अल्लाह मुख़ालिफ़त के बावजूद अपने नूर की मुकम्मलियत और दावाम की ज़मानत देता है।

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