कुरान - 9:34 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

34
۞يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِنَّ كَثِيرٗا مِّنَ ٱلۡأَحۡبَارِ وَٱلرُّهۡبَانِ لَيَأۡكُلُونَ أَمۡوَٰلَ ٱلنَّاسِ بِٱلۡبَٰطِلِ وَيَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِۗ وَٱلَّذِينَ يَكۡنِزُونَ ٱلذَّهَبَ وَٱلۡفِضَّةَ وَلَا يُنفِقُونَهَا فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ فَبَشِّرۡهُم بِعَذَابٍ أَلِيمٖ,

Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanooo inna kaseeramminal ahbaari warruhbaani la ya'kuloona amwaalan naasi bil baatili wa yasuddoona 'an sabeelil laah; wallazeena yaknizoonaz zahaba wal fiddata wa laayunfiqoonahaa fee sabeelil laahi fabashshirhum bi'azaabin aleem)

ऐ ईमान वालो! बेशक दानिशवरों और दरवेशों में से बहुत से [84] लोगों का माल नाहक़ खाते हैं [85] और अल्लाह की राह से रोकते हैं। और जो लोग सोना-चाँदी जमा करते हैं [86] और उसे अल्लाह की राह में ख़र्च नहीं करते, उन्हें दर्दनाक अज़ाब की ख़ुशख़बरी सुना दो। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 34 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 34 की तफ़्सीर

✅ [84] दानिशवरों और दरवेशों का मतलब

अहबार यहूदियों के दानिशवरों का ख़िताब था और रुहबान उनके दरवेशों का। इस आयत में मुसलमानों के दीनी रहनुमा और उनके उलमा शामिल नहीं हैं, जैसा कि आज के कुछ वहाबी लोग ग़लत समझते हैं।

यह आयत नेक सहाबा के दौर में नाज़िल हुई, जिन्होंने न कभी किसी का माल नाहक़ खाया और न किसी को अल्लाह की राह से रोका।

✅ [85] नाजायज़ कमाई और अदायगियाँ

यह बताता है कि नाजायज़ काम की मज़दूरी और उस काम की अदायगी जो इंसान पर ख़ुद फ़र्ज़ हो, बेकार और नाजायज़ है।

इसी तरह इन ज़रियों से कमाई नाजायज़ है: गाना, झूठी वक़ालत, फ़र्ज़ नमाज़ें पढ़ाने की मज़दूरी लेना, और उस तब्लीग़ी काम की अदायगी जो ख़ुद पर फ़र्ज़ हो (हवाला: रद्दुल मुख़्तार)।

जायज़ काम की अदायगी जायज़ है, जैसे कुरआन पढ़ाना, इमामत, और दूसरे इलाक़ों में दर्स देना जहाँ ये काम दूसरे भी कर सकते हैं — ऐसे वक़्त ये काम इंसान पर फ़र्ज़ नहीं होते।

✅ [86] माल जमा करना और फ़र्ज़ ज़कात

इससे मुराद नाजायज़ जमा-पूँजी है — यानी जमा हुए माल से फ़र्ज़ ज़कात और सदक़ा अदा न करना।

इससे हम सीखते हैं कि माल जमा करना जायज़ है बशर्ते उस माल के हुक़ूक़ (ज़कात) अदा किए जाएँ।

अगर माल जमा करना नाजायज़ होता, तो ज़कात फ़र्ज़ न होती। ज़कात तो उसी माल पर फ़र्ज़ होती है जो पूरा साल इंसान के पास रहे।

इसके अलावा हज़रत उस्मान, हज़रत ज़ुबैर बिन अव्वाम और दूसरे सहाबा जो अमीर हुए, उनकी मिसालें साबित करती हैं कि जायज़ तरीक़े से माल जमा करना मुबाह है।

बेजा ख़र्च हालाँकि नाजायज़ है, ताकि माल बरबाद न हो।

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