कुरान - 9:36 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

36
إِنَّ عِدَّةَ ٱلشُّهُورِ عِندَ ٱللَّهِ ٱثۡنَا عَشَرَ شَهۡرٗا فِي كِتَٰبِ ٱللَّهِ يَوۡمَ خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ مِنۡهَآ أَرۡبَعَةٌ حُرُمٞۚ ذَٰلِكَ ٱلدِّينُ ٱلۡقَيِّمُۚ فَلَا تَظۡلِمُواْ فِيهِنَّ أَنفُسَكُمۡۚ وَقَٰتِلُواْ ٱلۡمُشۡرِكِينَ كَآفَّةٗ كَمَا يُقَٰتِلُونَكُمۡ كَآفَّةٗۚ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلۡمُتَّقِينَ,

Transliteration: (Inna 'iddatash shuhoori 'indal laahis naa 'ashara shahran fee Kitaabil laahi yawma khalaqas samaawaati wal arda minhaaa arba'atun hurum; zaalikad deenul qaiyim; falaa tazlimoo feehinna anfusakum; wa qaatilul mushrikeena kaaaffatan kamaa yuqaati loonakum kaaaffah; wa'lamooo annal laaha ma'al muttaqeen)

बेशक अल्लाह के नज़दीक महीनों की गिनती बारह [90] है, अल्लाह की किताब में [91] उस दिन से जब उसने आसमान और ज़मीन पैदा की। उनमें से चार महीने हराम (मुक़द्दस) हैं [92]। यही सीधा दीन है। तो इन महीनों में अपनी जानों पर ज़ुल्म न करो [93]। और मुशरिकों से सब मिलकर जंग करो जैसे वे तुमसे सब मिलकर जंग करते हैं [94]। और जान लो कि अल्लाह मुत्तक़ियों के साथ है [95]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 36 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 36 की तफ़्सीर

✅ [90] अल्लाह के नज़दीक चांद के महीने

यह बताता है कि चांद के महीने अल्लाह के नज़दीक इज़्ज़त वाले हैं, क्योंकि मुक़द्दस महीने भी चांद के ही थे। इसलिए ज़कात, रोज़ा और हज जैसी सारी इबादतें चांद के कैलेंडर के मुताबिक़ अदा की जाती हैं।

✅ [91] साल बारह महीनों का होना चाहिए

इससे हम सीखते हैं कि मुशरिकों का कुछ सालों को तेरह महीनों का बना देना ज़लील और गुमराह करने वाला है। साल बारह महीनों का होना चाहिए, और हर महीने के दिन उनतीस या तीस होने चाहिए।

इन लोगों ने मौसमों के हिसाब से इस तरतीब को बदल डाला है।

✅ [92] चार मुक़द्दस महीने

तीन महीने लगातार हैं — ज़ुल-क़ादा, ज़ुल-हिज्जा और मुहर्रम — और एक अलग है, यानी रजब। ये चार महीने इस्लाम से पहले भी मुक़द्दस माने जाते थे; इस्लाम ने भी इन्हें हुरमत दी।

हालाँकि इन महीनों में जंग अब नाजायज़ नहीं, लेकिन इनकी ताज़ीम क़ायम है। इन महीनों में खूब इबादत की जाए और गुनाहों से बचने की हर कोशिश की जाए।

इससे हम सीखते हैं कि हर महीना, दिन या लम्हा एक जैसा नहीं। अगर सब एक जैसे होते, तो इंसान भी दर्जे और अज़मत में एक जैसे कैसे होते?

✅ [93] इन महीनों में अपने ऊपर ज़ुल्म न करना

इन चार महीनों में गुनाहों से बचने का ख़ास ख़याल रखा जाए, क्योंकि इनमें गुनाह करना सख़्त ज़ुल्म है। इसका यह मतलब भी हो सकता है कि आपस में एक-दूसरे पर ज़ुल्म न करो।

✅ [94] जो मुशरिक तुमसे लड़ें उनसे जंग करो

इसका मतलब है कि हर उस काफ़िर से हर वक़्त और हर जगह जंग करो जो तुमसे जंग करना चाहता है, जैसे जंग करने वाले या फ़ौजी। यह मुक़द्दस महीनों में जंग की मनाही को मंसूख़ करता है।

इससे हम सीखते हैं कि इस्लामी मुल्क में रहने वाले ग़ैर-मुस्लिम नागरिकों या अमन पसंद ग़ैर-मुस्लिमों से जंग करना नाजायज़ है; उनका ख़ून हमारे ख़ून जैसा है।

✅ [95] परहेज़गारी सबसे बेहतरीन हथियार

इसलिए जंग के वक़्त परहेज़गारी और पाकीज़गी को अपना सबसे बेहतरीन हथियार बनाओ।

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