Transliteration: (Inna 'iddatash shuhoori 'indal laahis naa 'ashara shahran fee Kitaabil laahi yawma khalaqas samaawaati wal arda minhaaa arba'atun hurum; zaalikad deenul qaiyim; falaa tazlimoo feehinna anfusakum; wa qaatilul mushrikeena kaaaffatan kamaa yuqaati loonakum kaaaffah; wa'lamooo annal laaha ma'al muttaqeen)
यह बताता है कि चांद के महीने अल्लाह के नज़दीक इज़्ज़त वाले हैं, क्योंकि मुक़द्दस महीने भी चांद के ही थे। इसलिए ज़कात, रोज़ा और हज जैसी सारी इबादतें चांद के कैलेंडर के मुताबिक़ अदा की जाती हैं।
इससे हम सीखते हैं कि मुशरिकों का कुछ सालों को तेरह महीनों का बना देना ज़लील और गुमराह करने वाला है। साल बारह महीनों का होना चाहिए, और हर महीने के दिन उनतीस या तीस होने चाहिए।
इन लोगों ने मौसमों के हिसाब से इस तरतीब को बदल डाला है।
तीन महीने लगातार हैं — ज़ुल-क़ादा, ज़ुल-हिज्जा और मुहर्रम — और एक अलग है, यानी रजब। ये चार महीने इस्लाम से पहले भी मुक़द्दस माने जाते थे; इस्लाम ने भी इन्हें हुरमत दी।
हालाँकि इन महीनों में जंग अब नाजायज़ नहीं, लेकिन इनकी ताज़ीम क़ायम है। इन महीनों में खूब इबादत की जाए और गुनाहों से बचने की हर कोशिश की जाए।
इससे हम सीखते हैं कि हर महीना, दिन या लम्हा एक जैसा नहीं। अगर सब एक जैसे होते, तो इंसान भी दर्जे और अज़मत में एक जैसे कैसे होते?
इन चार महीनों में गुनाहों से बचने का ख़ास ख़याल रखा जाए, क्योंकि इनमें गुनाह करना सख़्त ज़ुल्म है। इसका यह मतलब भी हो सकता है कि आपस में एक-दूसरे पर ज़ुल्म न करो।
इसका मतलब है कि हर उस काफ़िर से हर वक़्त और हर जगह जंग करो जो तुमसे जंग करना चाहता है, जैसे जंग करने वाले या फ़ौजी। यह मुक़द्दस महीनों में जंग की मनाही को मंसूख़ करता है।
इससे हम सीखते हैं कि इस्लामी मुल्क में रहने वाले ग़ैर-मुस्लिम नागरिकों या अमन पसंद ग़ैर-मुस्लिमों से जंग करना नाजायज़ है; उनका ख़ून हमारे ख़ून जैसा है।
इसलिए जंग के वक़्त परहेज़गारी और पाकीज़गी को अपना सबसे बेहतरीन हथियार बनाओ।
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