Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo maa lakum izaa qeela lakumun firoo fee sabeelil laahis saaqaltum ilal ard; aradeetum bilhayaatid dunyaa minal Aakhirah; famaamataa'ul hayaatiddunyaa fil Aakhirati illaa qaleel)
इससे हम सीखते हैं कि गुनाह करने से मुसलमान काफ़िर नहीं हो जाता, क्योंकि अल्लाह उन्हें मोमिन ही कहता है जो जिहाद में सुस्ती दिखाते हैं, हालाँकि जिहाद में कोताही गुनाह है।
यह आयत ग़ज़वा-ए-तबूक के मौके पर जिहाद का जज़्बा पैदा करने के लिए नाज़िल हुई। यह जंग रजब, 9 हिजरी में ग़ज़वा-ए-ताइफ़ के बाद हुई। तबूक मदीना से शाम की तरफ़ कई किलोमीटर दूर है।
नबी करीम ﷺ ने सख़्त काल और गर्मी के बावजूद बड़ी कोशिश की, जिससे मुसलमानों पर ज़ोर पड़ा।
नबी करीम ﷺ ने हज़रत अली मुर्तज़ा (रज़ि.) को मदीना में अपना नायब बनाया और 30,000 की फ़ौज लेकर निकले।
अब्दुल्लाह बिन उबैय और मुनाफ़िक़ सनिय्यतुल वदा पर लौट गए।
तबूक का कुआँ — जिसमें पानी बहुत कम था — नबी ﷺ की मुबारक पानी की बरकत से भर गया, और सैनिकों और जानवरों के लिए काफ़ी हुआ।
असल में कोई जंग नहीं हुई, क्योंकि क़ैसर हिरक़ल मुस्लिम फ़ौज के रौब से दब गया। नबी ﷺ ने दूमतुल जन्दल और ऐला के गवर्नरों से जज़िया लिया और मदीना लौट आए।
इस जंग के बाद हज़रत काब बिन मालिक, हिलाल बिन उमय्यह और मुरारा बिन रबी को (समाज से) अलग कर दिया गया (तफ़्सील आगे आती है)।
इसका मतलब है कि दुनिया की सब चीज़ें फ़ानी हैं, जबकि आख़िरत दाइमी और वाफ़िर है। इस दुनिया का सामान उसके मुक़ाबले बहुत थोड़ा है।
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