कुरान - 9:40 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

40
إِلَّا تَنصُرُوهُ فَقَدۡ نَصَرَهُ ٱللَّهُ إِذۡ أَخۡرَجَهُ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ ثَانِيَ ٱثۡنَيۡنِ إِذۡ هُمَا فِي ٱلۡغَارِ إِذۡ يَقُولُ لِصَٰحِبِهِۦ لَا تَحۡزَنۡ إِنَّ ٱللَّهَ مَعَنَاۖ فَأَنزَلَ ٱللَّهُ سَكِينَتَهُۥ عَلَيۡهِ وَأَيَّدَهُۥ بِجُنُودٖ لَّمۡ تَرَوۡهَا وَجَعَلَ كَلِمَةَ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ ٱلسُّفۡلَىٰۗ وَكَلِمَةُ ٱللَّهِ هِيَ ٱلۡعُلۡيَاۗ وَٱللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ,

Transliteration: (Illaa tansuroohu faqad nasarahul laahu iz akhrajahul lazeena kafaroo saaniyasnaini iz humaa filghaari iz yaqoolu lisaahibihee laa tahzan innnal laaha ma'anaa; fa anzalallaahu sakeenatahoo 'alaihi wa aiyadahoo bijunoodil lam tarawhaa wa ja'ala kalimatal lazeena kafarus suflaa; wa Kalimatul laahi hiyal 'ulyaa; wallaahu 'Azeezun Hakeem)

अगर तुम उनकी मदद नहीं करोगे, तो बेशक अल्लाह ने उनकी मदद की है, जब काफ़िरों ने उन्हें निकाला, दो में से दूसरे [109] को, जब वे दोनों ग़ार [110] में थे। जब उन्होंने अपने साथी [112] से कहा: "ग़म न करो, बेशक अल्लाह हमारे साथ है" [114]। फिर अल्लाह ने उन पर अपनी सकीना नाज़िल की और उन्हें ऐसे लश्करों से ताक़त दी जिन्हें तुमने नहीं देखा [116], और काफ़िरों का कलाम (बोल) नीचा कर दिया [117]। और अल्लाह का कलाम ही सबसे बुलंद है [118]। और अल्लाह ज़बरदस्त, हिकमत वाला है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 40 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 40 की तफ़्सीर

✅ [108] हिजरत के दौरान अल्लाह की मदद

अल्लाह ने हिजरत के दौरान नबी ﷺ की अनदेखे ज़रियों से मदद की। "बेशक" (फ़क़द) का लफ़्ज़ यहाँ एक छिपी शर्त का सबूत है, यानी चाहे तुम नबी ﷺ की मदद न करो, अल्लाह ने यक़ीनन मदद कर दी है। इसलिए इस आयत से कोई एतराज़ नहीं बनता।

✅ [109] काफ़िरों ने हिजरत का सबब बनाया

हिजरत अल्लाह के हुक्म से हुई, लेकिन काफ़िरों को उसका सबब कहा गया, क्योंकि उन्होंने नबी ﷺ को मक्का से निकाला।

✅ [110] अल्लाह की हिफ़ाज़त और मुशरिक

नबी ﷺ को मक्का से अल्लाह ने निकाला, मुशरिकों ने नहीं — जिनका इरादा उन्हें क़त्ल करने का था। अल्फ़ाज़ मुशरिकों को सबब के तौर पर दिखाते हैं, लेकिन अल्लाह की हिफ़ाज़त ही फ़ैसला कुन थी।

✅ [111] ग़ार में दो लोग

वे दो लोग नबी ﷺ और ग़ार में उनके साथी हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ (रज़ि.) थे। इसी वाक़ये से हज़रत अबू बकर (रज़ि.) का ख़िताब "साहिब-ए-ग़ार" (ग़ार के साथी) पड़ा।

✅ [112] हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ (रज़ि.) का मर्तबा

  • उनकी सोहबत पूरे ईमान और कुरआन पर क़ायम है; इसका इनकार कुफ़्र है।
  • उनका मर्तबा नबी ﷺ के बाद सबसे बुलंद है; नबी ﷺ की ग़ैरमौजूदगी में वे मोमिनों को नमाज़ पढ़ाते थे।
  • वे चार पुश्तों के साथी हैं, जो उनकी ख़ास पहचान है।
  • नबी ﷺ के फ़ौरन जानशीन (ख़लीफ़ा) हैं — यह इज़्ज़त वाला मुक़ाम उन्हें ज़िंदगी, मौत और आख़िरत में हासिल है।

✅ [113] "ग़म न करो" — हज़रत अबू बकर की फ़िक्र

हज़रत अबू बकर (रज़ि.) अपनी जान की फ़िक्र में नहीं थे (वे साँप से काटे जा चुके थे और बहुत कुछ क़ुर्बान कर चुके थे), बल्कि उन्हें नबी ﷺ की सलामती का डर था। उनकी यह फ़िक्र इबादत थी। अल्लाह ने मकड़ी के जाले और कबूतर के अंडों के ज़रिए मौजिज़ाना तौर पर दोनों की हिफ़ाज़त की।

✅ [114] "अल्लाह हमारे साथ है"

हज़रत मूसा (अलै.) ने "अल्लाह मेरे साथ है" कहा, जबकि नबी ﷺ ने "अल्लाह हमारे साथ है" फ़रमाया — यानी अल्लाह की मौजूदगी नबी ﷺ और हज़रत अबू बकर (रज़ि.) दोनों के साथ है।

✅ [115] हज़रत अबू बकर पर सकीना

अल्लाह ने हज़रत अबू बकर (रज़ि.) को सुकून और इत्मिनान अता किया, क्योंकि वे बेचैन थे — नबी ﷺ का दिल पहले से मुत्मइन था। अबू बकर (रज़ि.) को डर था कि काफ़िर उनका पता लगा लेंगे।

✅ [116] अनदेखी अल्लाही मदद

अल्लाह ने नबी ﷺ को अनदेखे लश्करों से मदद दी, जैसे फ़रिश्तों ने काफ़िरों का ध्यान भटकाया — ठीक वैसे ही जैसे बद्र और हुनैन जैसी जंगों में मदद हुई।

✅ [117] काफ़िरों की कोशिशें नाकाम

वे ग़ार-ए-सौर में तीन दिन रहे। काफ़िरों ने पकड़ने का इनाम रखा, लेकिन सारी कोशिशें नाकाम रहीं। सुराक़ा बिन मालिक उनका पीछा करता हुआ पहुँचा, मगर ख़ुद मुसलमान हो गया।

✅ [118] अल्लाह के कलाम की बरतरी

अल्लाह का कलाम हमेशा बुलंद है, और नबी ﷺ जैसे उसके महबूब बंदों की इज़्ज़त और कामयाबी हमेशा क़ायम रहती है।

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