Transliteration: (Illaa tansuroohu faqad nasarahul laahu iz akhrajahul lazeena kafaroo saaniyasnaini iz humaa filghaari iz yaqoolu lisaahibihee laa tahzan innnal laaha ma'anaa; fa anzalallaahu sakeenatahoo 'alaihi wa aiyadahoo bijunoodil lam tarawhaa wa ja'ala kalimatal lazeena kafarus suflaa; wa Kalimatul laahi hiyal 'ulyaa; wallaahu 'Azeezun Hakeem)
अल्लाह ने हिजरत के दौरान नबी ﷺ की अनदेखे ज़रियों से मदद की। "बेशक" (फ़क़द) का लफ़्ज़ यहाँ एक छिपी शर्त का सबूत है, यानी चाहे तुम नबी ﷺ की मदद न करो, अल्लाह ने यक़ीनन मदद कर दी है। इसलिए इस आयत से कोई एतराज़ नहीं बनता।
हिजरत अल्लाह के हुक्म से हुई, लेकिन काफ़िरों को उसका सबब कहा गया, क्योंकि उन्होंने नबी ﷺ को मक्का से निकाला।
नबी ﷺ को मक्का से अल्लाह ने निकाला, मुशरिकों ने नहीं — जिनका इरादा उन्हें क़त्ल करने का था। अल्फ़ाज़ मुशरिकों को सबब के तौर पर दिखाते हैं, लेकिन अल्लाह की हिफ़ाज़त ही फ़ैसला कुन थी।
वे दो लोग नबी ﷺ और ग़ार में उनके साथी हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ (रज़ि.) थे। इसी वाक़ये से हज़रत अबू बकर (रज़ि.) का ख़िताब "साहिब-ए-ग़ार" (ग़ार के साथी) पड़ा।
हज़रत अबू बकर (रज़ि.) अपनी जान की फ़िक्र में नहीं थे (वे साँप से काटे जा चुके थे और बहुत कुछ क़ुर्बान कर चुके थे), बल्कि उन्हें नबी ﷺ की सलामती का डर था। उनकी यह फ़िक्र इबादत थी। अल्लाह ने मकड़ी के जाले और कबूतर के अंडों के ज़रिए मौजिज़ाना तौर पर दोनों की हिफ़ाज़त की।
हज़रत मूसा (अलै.) ने "अल्लाह मेरे साथ है" कहा, जबकि नबी ﷺ ने "अल्लाह हमारे साथ है" फ़रमाया — यानी अल्लाह की मौजूदगी नबी ﷺ और हज़रत अबू बकर (रज़ि.) दोनों के साथ है।
अल्लाह ने हज़रत अबू बकर (रज़ि.) को सुकून और इत्मिनान अता किया, क्योंकि वे बेचैन थे — नबी ﷺ का दिल पहले से मुत्मइन था। अबू बकर (रज़ि.) को डर था कि काफ़िर उनका पता लगा लेंगे।
अल्लाह ने नबी ﷺ को अनदेखे लश्करों से मदद दी, जैसे फ़रिश्तों ने काफ़िरों का ध्यान भटकाया — ठीक वैसे ही जैसे बद्र और हुनैन जैसी जंगों में मदद हुई।
वे ग़ार-ए-सौर में तीन दिन रहे। काफ़िरों ने पकड़ने का इनाम रखा, लेकिन सारी कोशिशें नाकाम रहीं। सुराक़ा बिन मालिक उनका पीछा करता हुआ पहुँचा, मगर ख़ुद मुसलमान हो गया।
अल्लाह का कलाम हमेशा बुलंद है, और नबी ﷺ जैसे उसके महबूब बंदों की इज़्ज़त और कामयाबी हमेशा क़ायम रहती है।
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