कुरान - 9:41 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

41
ٱنفِرُواْ خِفَافٗا وَثِقَالٗا وَجَٰهِدُواْ بِأَمۡوَٰلِكُمۡ وَأَنفُسِكُمۡ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِۚ ذَٰلِكُمۡ خَيۡرٞ لَّكُمۡ إِن كُنتُمۡ تَعۡلَمُونَ,

Transliteration: (Infiroo khifaafanw wa siqaalanw wa jaahidoo bi amwaalikum wa anfusikum fee sabeelil laah; zaalikum khairul lakum in kuntum ta'lamoon)

निकलो, हल्के होकर और भारी होकर [119], और अल्लाह की राह में अपने माल और जान से जिहाद करो [120]। यह तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम जानो। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 41 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 41 की तफ़्सीर

✅ [119] हर हालत में जिहाद में शामिल होना फ़र्ज़

सभी मोमिनों — चाहे जवान हों या बूढ़े, अमीर या ग़रीब, सवार या पैदल, तंदुरुस्त या बीमार, फ़ारिग़ या घरेलू कामों में मसरूफ़ — को नबी ﷺ के साथ जंग (ग़ज़वा-ए-तबूक) में शामिल होने के लिए निकलना चाहिए।

यह फ़र्ज़ हर हाल में लागू है, चाहे वह नापसंद हो या मुश्किल। यह आयत पहले की नरमी को मंसूख़ करती है जो सूरा अत-तौबा 9:91 में थी, जहाँ कमज़ोर और बीमारों को छूट दी गई थी।

✅ [120] जिहाद की सूरतें

अल्लाह की राह में जिहाद की कई सूरतें हैं जो हालात पर मुनहसिर हैं: जान से (जंग करना), माल से (मदद करना), क़लम से (लिखना), या ज़बान से (पैरवी करना)। सबसे बड़ी नेमत उन्हें मिलती है जो इन सब सूरतों में शामिल हो पाते हैं।

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