Transliteration: ('Afal laahu 'anka lima azinta lahum hattaa yatabai yana lakal lazeena sadaqoo wa ta'lamal kaazibeen)
नबी करीम ﷺ का कुछ लोगों को पीछे रह जाने की इजाज़त देना कोई ग़लती नहीं, बल्कि मोहब्बत और नरमी का काम था। यह इजाज़त इससे पहले दी गई थी कि उन्हें इससे रोका जाए — इससे सहाबा के साथ उनका रहम दिल ज़ाहिर होता है।
नबी करीम ﷺ को पूरी तरह मालूम था कि उनमें कौन सच्चा है और कौन झूठा, लेकिन उन्होंने उनकी पहचान छिपाए रखी। आयत का मतलब है कि अगर यह इजाज़त न दी जाती, तो मुनाफ़िक़ खुले तौर पर रुसवा हो जाते। दुनियावी इल्म और रवैया आख़िर हक़ ज़ाहिर कर देता है, जैसा अल्लाह फ़रमाता है: "और तुम उन्हें उनकी बातचीत के अंदाज़ से ज़रूर पहचान लोगे" (सूरा मुहम्मद 47:30)।
ग़ज़वा-ए-तबूक के दौरान मुनाफ़िक़ों ने बीमारी और कमज़ोरी के बहाने पीछे रहने की इजाज़त माँगी। नबी ﷺ ने यह इजाज़त किसी ग़लती की वजह से नहीं, बल्कि दूरअंदेशी और हालात की हिकमत के तहत दी। यह इजाज़त अल्लाही मंसूबे का हिस्सा थी, कोई फ़ैसले में चूक नहीं।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat