कुरान - 9:44 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

44
لَا يَسۡتَـٔۡذِنُكَ ٱلَّذِينَ يُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ أَن يُجَٰهِدُواْ بِأَمۡوَٰلِهِمۡ وَأَنفُسِهِمۡۗ وَٱللَّهُ عَلِيمُۢ بِٱلۡمُتَّقِينَ,

Transliteration: (Laa yastaazinukal lazeena yu'minoona billaahi wal Yawmil Aakhiri ai yujaa hidoo bi amwaalihim wa anfusihim; wallaahu 'aleemum bilmut taqeen)

जो लोग अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान [129] रखते हैं, वे कभी आपसे अपने माल और जान से जिहाद [130] करने की इजाज़त नहीं माँगते। और अल्लाह मुत्तक़ियों को अच्छी तरह जानता है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 44 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 44 की तफ़्सीर

✅ [129] सच्चे ईमान में नबी ﷺ पर ईमान शामिल है

अल्लाह और आख़िरत पर सच्चे ईमान में नबी करीम ﷺ पर सच्चा ईमान ज़रूर शामिल है। मुनाफ़िक़ सिर्फ़ अल्लाह पर ईमान का दावा करते थे, लेकिन सच्चा ईमान नबी ﷺ की ज़ात और पैग़ाम को क़बूल किए बग़ैर मुकम्मल नहीं होता। बहाने बनाकर जिहाद से बचना निफ़ाक़ की साफ़ निशानी है।

✅ [130] बग़ैर बहाने माल और जान से जिहाद

जो सच्चे दिल से ईमान रखते हैं, वे अल्लाह की राह में जिहाद — चाहे माल ख़र्च करके या जान जोखिम में डालकर — में देरी या इजाज़त की दरख़्वास्त नहीं करते। उनकी तैयारी फ़ौरी और सच्ची होती है।

✅ [131] मुत्तक़ियों का हाल अल्लाह ही जानता है

अल्लाह ही मोमिनों की सच्ची नेकी और इबादत को जानता है, जो ज़ाहिरी सूरत या दावों से परे है।

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