Transliteration: (Law kaana 'aradan qareebanw wa safaran qaasidal lattaba'ooka wa laakim ba'udat 'alaihimush shuqqah; wa sayahlifoona billaahi lawis tata'naa lakharajnaa ma'akum; yuhlikoona anfusahum wal laahu ya'lamu innahum lakaa ziboon)
अगर जंग क़रीब होती या सफ़र आसान और आसान ग़नीमत का इमकान होता, तो ये मुनाफ़िक़ शामिल होते — असल ईमान की वजह से नहीं, बल्कि दुनियावी फ़ायदे की ख्वाहिश से। दीन में मुश्किल का डर और आसान फ़रार तलब करना निफ़ाक़ की बड़ी निशानी है।
नबी ﷺ की इताअत सच्चे और दिली जज़्बे से होनी चाहिए। मुनाफ़िक़ सिर्फ़ दुनियावी फ़ायदे के लिए इताअत दिखाते थे। अल्लाह सिर्फ़ उन्हीं से मोहब्बत और माफ़ी का वादा करता है जो सच्ची मोहब्बत से इताअत करते हैं।
मुनाफ़िक़ों में नबी ﷺ की सच्ची मोहब्बत नहीं थी, इसलिए मुश्किल सफ़र उन्हें नाक़ाबिल-ए-बरदाश्त लगा।
मुनाफ़िक़ झूठी और बेशुमार क़समें खाते हैं, जो निफ़ाक़ की निशानी है और रोज़ी में कमी लाती है। यह आयत मदीना लौटने पर उनकी झूठी क़समों की पेशीनगोई करती है, जो पूरी हुई।
झूठी क़सम खाना बड़ा गुनाह है और क़सम खाने वाले की तबाही का सबब बनता है; यह मुनाफ़िक़ की पहचान है।
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