Transliteration: (in tusibka hasanatun tasu'hum; wa in tusibka museebatuny yaqooloo qad akhaznaaa amranaa min qablu wa yatawallaw wa hum farihoon)
यह आयत बताती है कि काफ़िर नबी ﷺ और मुसलमानों की किसी भी मुश्किल पर ख़ुश होते हैं।
इसी तरह मुनाफ़िक़ मुसलमानों की कामयाबी और ख़ुशी पर ग़म या बेरुख़ी ज़ाहिर करते हैं।
सच्चे मुसलमान अपने भाइयों के सुख-दुख में शरीक होते हैं: "जब एक उज़्व (अंग) बीमार होता है, तो पूरा जिस्म बेचैन हो जाता है।"
जो उम्मत की तकलीफ़ पर बेपरवाह रहता है, वह रूहानी तौर पर कमज़ोर और जुड़ाव से महरूम है।
"मुसीबत" से मुराद मौत, ज़ख़्म या शिकस्त है।
हालाँकि आयत ज़ाहिरी तौर पर नबी ﷺ को ख़िताब करती है, इसका मतलब सभी मुसलमानों तक फैला है।
नबी ﷺ ने कभी किसी जंग से भागे नहीं; जो कोई इसके ख़िलाफ़ दावा करे, उसे तौबा की तरग़ीब देनी चाहिए। नबी ﷺ सबसे बहादुर माने जाते हैं।
"हमने पहले ही एहतियात कर ली थी" का जुमला मुनाफ़िक़ों के उस दावे की तरफ़ है कि उन्होंने अपनी जान बचाने के लिए जंग से बचा।
यह बताता है कि अल्लाह की राह में मुश्किलें न झेलना असल नुक़सान है, जबकि उन्हें सहना इनाम है।
जो अल्लाह की राह में खूब ख़र्च करते हैं वे रूहानी तौर पर नफ़ा उठाते हैं, जबकि जो रुकते हैं वे घाटे में रहते हैं। अल्लाह के मामले अक्सर दुनियावी अक़्ल के उलट होते हैं।
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