कुरान - 9:52 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

52
قُلۡ هَلۡ تَرَبَّصُونَ بِنَآ إِلَّآ إِحۡدَى ٱلۡحُسۡنَيَيۡنِۖ وَنَحۡنُ نَتَرَبَّصُ بِكُمۡ أَن يُصِيبَكُمُ ٱللَّهُ بِعَذَابٖ مِّنۡ عِندِهِۦٓ أَوۡ بِأَيۡدِينَاۖ فَتَرَبَّصُوٓاْ إِنَّا مَعَكُم مُّتَرَبِّصُونَ,

Transliteration: (Qul hal tarabbasoona binaaa illaaa ihdal husnayayni wa nahnu natrabbasu bikum ai yus eebakumul laahu bi'azaa bim min 'indiheee aw biaidee naa fatarabbasooo innaa ma'akum mutarabbisoon)

(ऐ नबी ﷺ) कह दीजिए: तुम हमारे बारे में दो भलाइयों में से एक के सिवा किसी का इंतज़ार करते हो? और हम तुम्हारे बारे में इंतज़ार करते हैं कि अल्लाह तुम्हें अपनी तरफ़ से [147] या हमारे हाथों अज़ाब दे। तो तुम इंतज़ार करो, हम भी तुम्हारे साथ इंतज़ार करते हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 52 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 52 की तफ़्सीर

✅ [146] भलाई या शहादत का इंतज़ार

मुनाफ़िक़ हमारे बारे में दो चीज़ों में से एक का इंतज़ार करते हैं: भलाई या शहादत।

यह दिखाता है कि मोमिन के लिए मुसीबत भी अल्लाह की रहमत है, क्योंकि आज़माइशों में सब्र करने पर बड़ा सवाब मिलता है।

शहादत की कई क़िस्में हैं:

  • दुश्मन के वार से ज़ख़्मी होना — यानी मुजाहिद।
  • दुश्मन के हाथों मारा जाना — यानी शहीद।
  • मुसीबत में मुब्तला होना — यह मोमिन के लिए रोज़े जैसा है।
  • मुश्किल पर क़ाबू पाना — यह ईद मनाने जैसा है।

हर हाल में मोमिन रूहानी तौर पर नफ़ा उठाता है।

✅ [147] अल्लाह की तरफ़ से अज़ाब

"अपनी तरफ़ से अज़ाब" से मुराद अल्लाह का बराह-ए-रास्त अज़ाब है, जैसे कुफ़्र की हालत में मौत और फिर क़ब्र व आख़िरत का अज़ाब।

कुछ विद्वान इसे उन अज़ाबों से समझाते हैं जो पुरानी क़ौमों — जैसे समूद और आद — पर आए, यानी अनजाने या ग़ैर-मामूली ज़रियों से आने वाले सज़ा के वाक़यात।

इनमें जिस्म की सूरत बिगाड़ना (मस्ख़) या ज़मीन में धँसाना (ख़स्फ़) जैसी क़िस्में शामिल हैं। नबी ﷺ के ज़माने से ये आम अज़ाब बंद हो गए, लेकिन क़ियामत से पहले इनकी ख़ास सूरतें आ सकती हैं।

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