कुरान - 9:53 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

53
قُلۡ أَنفِقُواْ طَوۡعًا أَوۡ كَرۡهٗا لَّن يُتَقَبَّلَ مِنكُمۡ إِنَّكُمۡ كُنتُمۡ قَوۡمٗا فَٰسِقِينَ,

Transliteration: (Qul anfiqoo taw'an aw karhal lany yutaqabbala min kum innakum kuntum qawman faasiqeen)

(ऐ नबी ﷺ) कह दीजिए: तुम ख़ुशी से ख़र्च करो या नाराज़गी से, तुमसे हरगिज़ क़बूल नहीं किया जाएगा। बेशक तुम नाफ़रमान लोग हो [148]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 53 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 53 की तफ़्सीर

✅ [148] शान-ए-नुज़ूल और मतलब

यह आयत ग़ज़वा-ए-तबूक के दौरान मुनाफ़िक़ जद बिन क़ैस के जवाब में नाज़िल हुई, जिसने जंग में शामिल न होने पर माफ़ी माँगी लेकिन माल दान करने की पेशकश की।

आयत बताती है कि चाहे मुनाफ़िक़ ख़ुशी से ख़र्च करें या नाराज़गी से, उनका ख़र्च क़बूल नहीं होगा — न नबी ﷺ की तरफ़ से, न अल्लाह की तरफ़ से।

यहाँ "तुम ख़र्च करो" कोई फ़र्ज़ का हुक्म नहीं, बल्कि एक इत्तिलाअती बयान है जो उनकी पेशकश की सच्चाई को रद्द करता है।

रूहुल बयान के मुफ़स्सिर के अनुसार जद बिन क़ैस बाद में सच्चे दिल से मुसलमान हुआ और हज़रत उस्मान (रज़ि.) के दौरे-ख़िलाफ़त में मरा।

यह आयत बताती है कि जब अंदरूनी नियत झूठी हो, तो नाफ़रमानी और निफ़ाक़ ज़ाहिरी नेक कामों को भी बेकार कर देते हैं।

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