Transliteration: (Falaa tu'jibka amwaaluhum wa laaa awlaaduhum; innamaa yureedul laahu liyu'az zibahum bihaa fil hayaatid dunyaa wa tazhaqa anfusuhum wa hum kaafiroon)
मुसलमानों को आगाह किया गया कि मुनाफ़िक़ों के माल और नेमतों को देखकर हैरान न हों।
हालाँकि वे ज़ाहिरी तौर पर कामयाब दिखते हैं, नबी करीम ﷺ की नज़र में उनका माल बेहद हक़ीर था — "मच्छर के पंख से भी कम।"
मेहनत से माल जमा करना, उसकी सख़्ती से हिफ़ाज़त करना, और फिर पछतावे के साथ उसे छोड़कर मर जाना — यह ख़ुद अल्लाह की तरफ़ से एक सज़ा है।
माली कामयाबी अल्लाह की क़ुबूलियत या कामयाबी की ज़मानत नहीं देती।
अगर माल या औलाद इंसान को अल्लाह से ग़ाफ़िल कर दें, तो यह अज़ाब की एक सूरत है।
मालदारों को अक्सर दर्दनाक मौत का सामना करना पड़ता है, क्योंकि उन्हें दुनिया और माल — दोनों छोड़ने का दोहरा दर्द झेलना पड़ता है।
इसके उलट, मोमिन की मौत आसान होती है और उसे नबी ﷺ से मिलने की ख़ुशी माना जाता है, जिसे "उर्स" कहा जाता है — दुल्हे (नबी ﷺ) से मुलाक़ात का शादी का दिन।
मौत उस ट्रेन जैसी है जो मुजरिमों को सज़ा तक ले जाती है, जबकि मोमिनों के लिए वह जश्न और अल्लाह से मुलाक़ात का ज़रिया है।
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