कुरान - 9:54 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

54
وَمَا مَنَعَهُمۡ أَن تُقۡبَلَ مِنۡهُمۡ نَفَقَٰتُهُمۡ إِلَّآ أَنَّهُمۡ كَفَرُواْ بِٱللَّهِ وَبِرَسُولِهِۦ وَلَا يَأۡتُونَ ٱلصَّلَوٰةَ إِلَّا وَهُمۡ كُسَالَىٰ وَلَا يُنفِقُونَ إِلَّا وَهُمۡ كَٰرِهُونَ,

Transliteration: (Wa maa mana'ahum 'an tuqbala minhum nafaqaatuhum illaaa annahum kafaroo billaahi wa bi Rasoolihee wa laa ya'toonas Salaata illaa wa hum kusaalaa wa laa yunfiqoona illaa wa hum kaarihoon)

और उनके ख़र्चों के क़बूल होने में सिर्फ़ यही चीज़ माने हुए थी कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का इनकार [149] किया। और वे नमाज़ में सुस्ती [150] के साथ आते हैं, और ख़र्च भी सिर्फ़ नाराज़गी के साथ करते हैं [151]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 54 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 54 की तफ़्सीर

✅ [149] अल्लाह और रसूल का इनकार

यह आयत सिखाती है कि जो अल्लाह और उसके रसूल का इनकार करे, उसकी इबादत क़बूल नहीं होती।

जैसे शाख़ जड़ से जुड़े बग़ैर फल नहीं देती, उसी तरह नेक कामों की क़बूलियत के लिए ज़रूरी है कि वे नबी करीम ﷺ की सच्ची ग़ुलामी (सच्चे ईमान) में जड़े हों।

✅ [150] नमाज़ में सुस्ती

नमाज़ में कसरत से पढ़ना मुनाफ़िक़ों की ख़ासियत है।

इससे कई फ़िक़्ही और रूहानी सबक़ मिलते हैं:

  • नमाज़ आख़िरी लम्हे में पढ़ना।
  • हमेशा जमाअत के बग़ैर नमाज़ पढ़ना।
  • नंगे सर, खुले बटनों या लपेटी हुई आस्तीनों के साथ नमाज़ पढ़ना।

ये सब कसरत की निशानियाँ हैं और नमाज़ में नापसंदीदा काम हैं।

✅ [151] नाराज़गी से ख़र्च करना

मुनाफ़िक़ नाराज़गी के साथ ख़र्च करते हैं, क्योंकि वे सच्चे दिल से उसके सवाब पर ईमान नहीं रखते।

उनका ख़र्च निफ़ाक़ छुपाने या दुनियावी एहसान हासिल करने के लिए होता है।

जो ख़र्च नमूद (दिखावे) या ताने से बचने के लिए हो, वह अल्लाह के हाँ बेसवाब रहेगा।

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