Transliteration: (Wa maa mana'ahum 'an tuqbala minhum nafaqaatuhum illaaa annahum kafaroo billaahi wa bi Rasoolihee wa laa ya'toonas Salaata illaa wa hum kusaalaa wa laa yunfiqoona illaa wa hum kaarihoon)
यह आयत सिखाती है कि जो अल्लाह और उसके रसूल का इनकार करे, उसकी इबादत क़बूल नहीं होती।
जैसे शाख़ जड़ से जुड़े बग़ैर फल नहीं देती, उसी तरह नेक कामों की क़बूलियत के लिए ज़रूरी है कि वे नबी करीम ﷺ की सच्ची ग़ुलामी (सच्चे ईमान) में जड़े हों।
नमाज़ में कसरत से पढ़ना मुनाफ़िक़ों की ख़ासियत है।
इससे कई फ़िक़्ही और रूहानी सबक़ मिलते हैं:
ये सब कसरत की निशानियाँ हैं और नमाज़ में नापसंदीदा काम हैं।
मुनाफ़िक़ नाराज़गी के साथ ख़र्च करते हैं, क्योंकि वे सच्चे दिल से उसके सवाब पर ईमान नहीं रखते।
उनका ख़र्च निफ़ाक़ छुपाने या दुनियावी एहसान हासिल करने के लिए होता है।
जो ख़र्च नमूद (दिखावे) या ताने से बचने के लिए हो, वह अल्लाह के हाँ बेसवाब रहेगा।
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