कुरान - 9:58 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

58
وَمِنۡهُم مَّن يَلۡمِزُكَ فِي ٱلصَّدَقَٰتِ فَإِنۡ أُعۡطُواْ مِنۡهَا رَضُواْ وَإِن لَّمۡ يُعۡطَوۡاْ مِنۡهَآ إِذَا هُمۡ يَسۡخَطُونَ,

Transliteration: (Wa minhum mai yalmizuka fis sadaqaati fa-in u'too minhaa radoo wa illam yu'taw minhaaa izaa hum yaskhatoon)

और उनमें से कुछ ऐसे हैं जो सदक़ों की तक़सीम में आप पर एतराज़ [157] करते हैं। फिर अगर उन्हें उसमें से कुछ मिल जाए तो ख़ुश होते हैं, और अगर न मिले तो नाराज़ हो जाते हैं [158]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 58 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 58 की तफ़्सीर

✅ [157] शान-ए-नुज़ूल

एक बार नबी करीम ﷺ ग़नीमत की तक़सीम कर रहे थे कि हरकूस बिन ज़ुहैर तमीमी (ज़ुलख़ुवैसिरा के नाम से मशहूर) ने आपसे "इंसाफ़ करने" की तलब की। इस पर हज़रत उमर (रज़ि.) नाराज़ हुए और चाहा कि उसका सर क़लम कर दिया जाए।

लेकिन नबी ﷺ ने रोकते हुए फ़रमाया कि इस आदमी की औलाद से ऐसे लोग पैदा होंगे जो नमाज़ और कुरआन की तिलावत में माहिर होंगे, लेकिन आख़िर में दीन से उसी तरह निकल जाएँगे जैसे तीर कमान से निकल जाता है। इसी के जवाब में यह आयत नाज़िल हुई।

इससे हम सीखते हैं कि नबी ﷺ के मुबारक कामों पर एतराज़ करना कुफ़्र है।

✅ [158] मुनाफ़िक़ों की स्वार्थीता

नबी ﷺ से दुनियावी फ़ायदा मिलने पर ही ख़ुश होना और महरूम होने पर नाराज़ होना निफ़ाक़ की बड़ी निशानी है।

ऐसा इंसान कभी सच्चे दिल से रसूल पर ईमान नहीं लाया, बल्कि उसने अपनी स्वार्थी ख्वाहिशों की बिना पर ईमान क़बूल किया।

वह कुत्ते से भी बदतर है, क्योंकि कुत्ता सज़ा खाने के बाद भी अपने मालिक का साथ नहीं छोड़ता।

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